लोकतन्त्र का काला सच या जनसेवा की हकीकत
फोटो -साभार आज संत रविदास जी की जयंती है। सार्वजनिक अवकाश होने के कारण गुप्ता जी को कार्यालय जाने की कोई टेंशन नहीं थी। लंबी तानकर सोने का मन था। गुप्ता जी का मानना था कि जिंदगी का असली मजा तो सोने में है। बीबी- बच्चों से कल रात ही करबद्ध प्रार्थना कर ली थी कि कृपा करके सुबह- सुबह डिस्टर्ब न करें। बड़े - बड़े पुण्यकर्मों के बाद तो छुट्टी नसीब होती है , सो जी भरकर सो लेने दें । सुबह के सात ही बजे थे , कि पत्नी ने झिंझोड़- झिंझोड़ कर जगा दिया। “ अजी , उठो न। कब से चिल्ला रही हूँ , इंसान हो या कुंभकर्ण ?” क्या हुआ , क्या बात है ? सुबह- सुबह नींद क्यों खराब कर रही हो। गुप्ता जी मन हुआ कि चीख- चीखकर आसमान सर पर उठा लें , पर एक आम भारतीय पति की तरह मजबूरी में गुस्सा पीने की आदत उन्हें पड़ चुकी थी। अरे , रामभरोसे आया है , अपना दूधवाला। तो मैं क्या करूँ ? दूध तो तुमने लेना है न। वो आप से मिलना चाहता है। कोई जरूरी काम है शायद। ...