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जर्मन चित्रकारों के 170 वर्ष पुराने चित्रों की प्रदर्शनी: दून लाइब्रेरी में हुआ शुभारंभ

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देहरादून,1 मई 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में आज  जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं द्वारा  निर्मित 170 साल पुराने चित्रों की प्रदर्शनी का शुभारम्भ हुआ। पहाड़ संस्था के प्रो. शेखर पाठक की विशेष पहल से हिमालय के यह दुर्लभ चित्र जर्मनी के म्यूनिख संग्रहालय से निकल कर आम लोगों के बीच अवलोकन के लिए पहुंचे हैं। इसमें इसे म्यूनिख संग्रहालय सहित श्लांगिटवाइट के पांरिवारिक सदस्यों के साथ-साथ प्रो. हरमन क्रुत्जमैन , मैडम स्टेफनी क्लेइट, स्टीफन रिट्टर आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आम जन के लिए प्रदर्शित हिमालय के चित्रों की प्रदर्शनी की इस श्रंखला की शुरूआत दिल्ली के इंडिया इन्टरनेशनल सैण्टर से हुई, जो आज देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र तक पहुंची है।  इसके बाद यह नैनीताल के सीआरएसटी काॅलेज में प्रदर्शित होने जा रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि दून पुस्तकालय में लगी इस प्रदर्शनी के चित्रों में आम लोगों को जम्मू कश्मीर से लेकर बदरीनाथ,केदार नाथ ,मिलम,सुन्दरढूंगा, नैनीताल और पूरब में दार्जिलिंग तक के तत्कालीन इतिहास की कई शानदार झलकियां देखने को मिल सकेंगी, जिनसे आम लोग ...

जर्मन चित्रकारों के 170 वर्ष पुराने चित्रों की प्रदर्शनी: दून लाइब्रेरी में हुआ शुभारंभ

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देहरादून,1 मई 2026। दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र में आज  जर्मनी के श्लागिंटवाईट बन्धुओं द्वारा  निर्मित 170 साल पुराने चित्रों की प्रदर्शनी का शुभारम्भ हुआ। पहाड़ संस्था के प्रो. शेखर पाठक की विशेष पहल से हिमालय के यह दुर्लभ चित्र जर्मनी के म्यूनिख संग्रहालय से निकल कर आम लोगों के बीच अवलोकन के लिए पहुंचे हैं। इसमें इसे म्यूनिख संग्रहालय सहित श्लांगिटवाइट के पांरिवारिक सदस्यों के साथ-साथ प्रो. हरमन क्रुत्जमैन , मैडम स्टेफनी क्लेइट, स्टीफन रिट्टर आदि का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। आम जन के लिए प्रदर्शित हिमालय के चित्रों की प्रदर्शनी की इस श्रंखला की शुरूआत दिल्ली के इंडिया इन्टरनेशनल सैण्टर से हुई, जो आज देहरादून के दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र तक पहुंची है।  इसके बाद यह नैनीताल के सीआरएसटी काॅलेज में प्रदर्शित होने जा रही है। महत्वपूर्ण बात यह है कि दून पुस्तकालय में लगी इस प्रदर्शनी के चित्रों में आम लोगों को जम्मू कश्मीर से लेकर बदरीनाथ,केदार नाथ ,मिलम,सुन्दरढूंगा, नैनीताल और पूरब में दार्जिलिंग तक के तत्कालीन इतिहास की कई शानदार झलकियां देखने को मिल सकेंगी, जिनसे आम लोग ...

किशोर संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति: ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण

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देहरादून में 25 अप्रैल को एक भव्य कार्यक्रम में सत्रह वर्षीय कवयित्री सिद्धि भण्डारी के प्रथम कविता संग्रह ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समकालीन साहित्य, किशोर लेखन और रचनात्मकता की दिशा पर गंभीर विमर्श का अवसर भी बना। लेखन: ठहराव का एक रचनात्मक क्षण कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए सिद्धि ने लेखन को एक गहरे आत्मिक अनुभव के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, लिखना महज़ शब्दों को पंक्तिबद्ध करना नहीं है, बल्कि यह जीवन की भागदौड़ के बीच स्वयं से मिलने का एक ठहराव है। आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में मनुष्य अपनी संवेदनाओं, अनुभवों और अवलोकन की क्षमता को खोता जा रहा है। ऐसे में लेखन एक माध्यम बन सकता है, जो हमें अपने भीतर झांकने और दुनिया को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देता है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि हर व्यक्ति की अपनी एक कथा होती है, लेकिन हम उसे समझने और व्यक्त करने की प्रक्रिया से दूर होते जा रहे हैं। उनका मानना है कि यदि हम ठहरकर सोचें, मह...

किशोर संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति: ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण

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देहरादून में 25 अप्रैल को एक भव्य कार्यक्रम में सत्रह वर्षीय कवयित्री सिद्धि भण्डारी के प्रथम कविता संग्रह ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समकालीन साहित्य, किशोर लेखन और रचनात्मकता की दिशा पर गंभीर विमर्श का अवसर भी बना। लेखन: ठहराव का एक रचनात्मक क्षण कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए सिद्धि ने लेखन को एक गहरे आत्मिक अनुभव के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, लिखना महज़ शब्दों को पंक्तिबद्ध करना नहीं है, बल्कि यह जीवन की भागदौड़ के बीच स्वयं से मिलने का एक ठहराव है। आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में मनुष्य अपनी संवेदनाओं, अनुभवों और अवलोकन की क्षमता को खोता जा रहा है। ऐसे में लेखन एक माध्यम बन सकता है, जो हमें अपने भीतर झांकने और दुनिया को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देता है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि हर व्यक्ति की अपनी एक कथा होती है, लेकिन हम उसे समझने और व्यक्त करने की प्रक्रिया से दूर होते जा रहे हैं। उनका मानना है कि यदि हम ठहरकर सोचें, मह...

बैगलेस डे पर बच्चों ने दिखाई प्रतिभा

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देहरादून 25 अप्रैल। राजकीय प्राथमिक विद्यालय रामगढ़ में आज नवीन शैक्षिक सत्र 2026-27 के पहले बैग लेस डे/प्रतिभा दिवस का आयोजन किया गया। प्रतिभा दिवस के अंतर्गत विभागीय निर्देशों के अनुपालन में माता सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। जिसमें विद्यालय में अध्यनरत छात्रों की माताओं ने प्रतिभाग किया। सभी कक्षाओं के छात्र-छात्राओं ने उपस्थित माताओं के सम्मुख आज के प्रतिभा दिवस के लिये निर्धारित गतिविधियों हिंदी, अंग्रेजी भाषा में अपना परिचय, कविता इत्यादि का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही कक्षा 1 एवं 2 के छात्रों के लिये निर्धारित गतिविधियां अंग्रेजी के शब्द बोलना, ताली बजाना, कमर में हाथ रखकर उछलना, रंगीन चौक से रेखा खींचना, पैटर्न बनाना, रंगों के छापे लगाना तथा कक्षा तीन, चार एवं पांच के लिये स्थानीय मेले पर चर्चा, लंबाई का अनुमान लगाना तथा फिर उसे नापना, चित्रों में रंग भरना, 50 मीटर दौड़, छापे लगाना इत्यादि गतिविधियां संपन्न करवायी गयी। इससे पूर्व माता सम्मेलन में उपस्थित माताओं को राजकीय प्राथमिक विद्यालय रामगढ़ के प्रधानाध्यापक अरविन्द सोलंकी ने बैग लेस डे/प्रतिभा दिवस की अ...

बैगलेस डे पर बच्चों ने दिखाई प्रतिभा

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देहरादून 25 अप्रैल। राजकीय प्राथमिक विद्यालय रामगढ़ में आज नवीन शैक्षिक सत्र 2026-27 के पहले बैग लेस डे/प्रतिभा दिवस का आयोजन किया गया। प्रतिभा दिवस के अंतर्गत विभागीय निर्देशों के अनुपालन में माता सम्मेलन का भी आयोजन किया गया। जिसमें विद्यालय में अध्यनरत छात्रों की माताओं ने प्रतिभाग किया। सभी कक्षाओं के छात्र-छात्राओं ने उपस्थित माताओं के सम्मुख आज के प्रतिभा दिवस के लिये निर्धारित गतिविधियों हिंदी, अंग्रेजी भाषा में अपना परिचय, कविता इत्यादि का प्रदर्शन किया। इसके साथ ही कक्षा 1 एवं 2 के छात्रों के लिये निर्धारित गतिविधियां अंग्रेजी के शब्द बोलना, ताली बजाना, कमर में हाथ रखकर उछलना, रंगीन चौक से रेखा खींचना, पैटर्न बनाना, रंगों के छापे लगाना तथा कक्षा तीन, चार एवं पांच के लिये स्थानीय मेले पर चर्चा, लंबाई का अनुमान लगाना तथा फिर उसे नापना, चित्रों में रंग भरना, 50 मीटर दौड़, छापे लगाना इत्यादि गतिविधियां संपन्न करवायी गयी। इससे पूर्व माता सम्मेलन में उपस्थित माताओं को राजकीय प्राथमिक विद्यालय रामगढ़ के प्रधानाध्यापक अरविन्द सोलंकी ने बैग लेस डे/प्रतिभा दिवस की अ...

देवेन्द्र मेवाड़ी की “यायावर की यादें” का लोकार्पण: विज्ञान, साहित्य और स्मृतियों का संगम

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देहरादून, 24 अप्रैल।  देहरादून की साहित्यिक परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी, जब वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की चर्चित कृति “यायावर की यादें” का लोकार्पण हुआ। दून लाइब्रेरी एवं शोध केंद्र के सभागार में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक पुस्तक का विमोचन नहीं था, बल्कि विज्ञान, साहित्य, समाज और स्मृतियों के बहुआयामी संवाद का अवसर भी बना। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों, लेखकों और चिंतकों ने न केवल पुस्तक पर अपने विचार रखे, बल्कि वर्तमान समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और साहित्य की भूमिका पर भी गंभीर विमर्श किया। देहरादून की लेखन परंपरा  और वैज्ञानिक चेतना का प्रश्न कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्यकार राजेश सकलानी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि देहरादून लंबे समय से लेखकों और कवियों की उर्वर भूमि रही है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आज के समय में वैज्ञानिक चेतना का अभाव बढ़ता जा रहा है। उनके अनुसार, 1970 के दशक में जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज में दिखाई देता था, वह आज कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ा है। उन्होंने कहा कि समाज कभी एकरूप नहीं होता, लेकिन बौद्धिक वर्ग ही उ...