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देवेन्द्र मेवाड़ी की “यायावर की यादें” का लोकार्पण: विज्ञान, साहित्य और स्मृतियों का संगम

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देहरादून, 24 अप्रैल।  देहरादून की साहित्यिक परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी, जब वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की चर्चित कृति “यायावर की यादें” का लोकार्पण हुआ। दून लाइब्रेरी एवं शोध केंद्र के सभागार में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक पुस्तक का विमोचन नहीं था, बल्कि विज्ञान, साहित्य, समाज और स्मृतियों के बहुआयामी संवाद का अवसर भी बना। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों, लेखकों और चिंतकों ने न केवल पुस्तक पर अपने विचार रखे, बल्कि वर्तमान समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और साहित्य की भूमिका पर भी गंभीर विमर्श किया। देहरादून की लेखन परंपरा  और वैज्ञानिक चेतना का प्रश्न कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्यकार राजेश सकलानी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि देहरादून लंबे समय से लेखकों और कवियों की उर्वर भूमि रही है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आज के समय में वैज्ञानिक चेतना का अभाव बढ़ता जा रहा है। उनके अनुसार, 1970 के दशक में जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज में दिखाई देता था, वह आज कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ा है। उन्होंने कहा कि समाज कभी एकरूप नहीं होता, लेकिन बौद्धिक वर्ग ही उ...

देवेन्द्र मेवाड़ी की “यायावर की यादें” का लोकार्पण: विज्ञान, साहित्य और स्मृतियों का संगम

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देहरादून, 24 अप्रैल।  देहरादून की साहित्यिक परंपरा एक बार फिर जीवंत हो उठी, जब वरिष्ठ विज्ञान लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी की चर्चित कृति “यायावर की यादें” का लोकार्पण हुआ। दून लाइब्रेरी एवं शोध केंद्र के सभागार में आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक पुस्तक का विमोचन नहीं था, बल्कि विज्ञान, साहित्य, समाज और स्मृतियों के बहुआयामी संवाद का अवसर भी बना। कार्यक्रम में उपस्थित साहित्यकारों, लेखकों और चिंतकों ने न केवल पुस्तक पर अपने विचार रखे, बल्कि वर्तमान समाज में वैज्ञानिक दृष्टिकोण और साहित्य की भूमिका पर भी गंभीर विमर्श किया। देहरादून की लेखन परंपरा  और वैज्ञानिक चेतना का प्रश्न कार्यक्रम की शुरुआत में साहित्यकार राजेश सकलानी ने अपने विचार रखते हुए कहा कि देहरादून लंबे समय से लेखकों और कवियों की उर्वर भूमि रही है। उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि आज के समय में वैज्ञानिक चेतना का अभाव बढ़ता जा रहा है। उनके अनुसार, 1970 के दशक में जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण समाज में दिखाई देता था, वह आज कहीं न कहीं कमज़ोर पड़ा है। उन्होंने कहा कि समाज कभी एकरूप नहीं होता, लेकिन बौद्धिक वर्ग ही उ...

लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यह भी है जरूरी...

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एक सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहतेथे !सरोवर के  बीचों-बीच एक बहुत पुराना धातु  का खम्भा भी लगा हुआ था,जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने  लगवाया  था। खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी  थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस करवाई जाए।रेस में भाग  लेने वाले को  खम्भे पर चढ़ना होगा , और  जो  सबसे पहले एक ऊपर पहुंच  जाएगा वही विजेता माना  जाएगा। रेस का दिन आ पंहुचा,चारो तरफ बहुत भीड़ थी । आस -पास  के  इलाकों  से  भी कई  मेंढक  इस  रेस  में  हिस्सा लेने पहुचे   . माहौल में  सरगर्मी थी   , हर  तरफ शोर ही शोर  था । रेस  शुरू  हुई … …लेकिन खम्भे को देखकर  भीड़  में  एकत्र  हुए  किसी  भी  मेंढक  को  ये  यकीन  नहीं हुआकि  कोई भी  मेंढक   ऊपर  तक  पहुंच पायेगा … हर  तरफ  यही सुनाई  देता … “ अरे  ये बहुत  कठिन  है ” “ वो  कभी भी ये  रेस  पूरी  नहीं  कर  पायंगे ” “ सफलता का  तो  कोई  सवाल ही नहीं  , इतने  चिकने  खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता  ” और  यही हो भी  रहा  था , जो भी  मेंढक  कोशिश  करता , वो  थोडा  ऊपर  जाकर  नीचे  गिर  जाता , कई  मेंढक दो -तीन  बार ...

लक्ष्य तक पहुंचने के लिए यह भी है जरूरी...

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एक सरोवर में बहुत सारे मेंढक रहतेथे !सरोवर के  बीचों-बीच एक बहुत पुराना धातु  का खम्भा भी लगा हुआ था,जिसे उस सरोवर को बनवाने वाले राजा ने  लगवाया  था। खम्भा काफी ऊँचा था और उसकी सतह भी बिलकुल चिकनी  थी। एक दिन मेंढकों के दिमाग में आया कि क्यों ना एक रेस करवाई जाए।रेस में भाग  लेने वाले को  खम्भे पर चढ़ना होगा , और  जो  सबसे पहले एक ऊपर पहुंच  जाएगा वही विजेता माना  जाएगा। रेस का दिन आ पंहुचा,चारो तरफ बहुत भीड़ थी । आस -पास  के  इलाकों  से  भी कई  मेंढक  इस  रेस  में  हिस्सा लेने पहुचे   . माहौल में  सरगर्मी थी   , हर  तरफ शोर ही शोर  था । रेस  शुरू  हुई … …लेकिन खम्भे को देखकर  भीड़  में  एकत्र  हुए  किसी  भी  मेंढक  को  ये  यकीन  नहीं हुआकि  कोई भी  मेंढक   ऊपर  तक  पहुंच पायेगा … हर  तरफ  यही सुनाई  देता … “ अरे  ये बहुत  कठिन  है ” “ वो  कभी भी ये  रेस  पूरी  नहीं  कर  पायंगे ” “ सफलता का  तो  कोई  सवाल ही नहीं  , इतने  चिकने  खम्भे पर चढ़ा ही नहीं जा सकता  ” और  यही हो भी  रहा  था , जो भी  मेंढक  कोशिश  करता , वो  थोडा  ऊपर  जाकर  नीचे  गिर  जाता , कई  मेंढक दो -तीन  बार ...

यहां खरीदी गई थी दुनिया की सबसे महंगी जमीन,बदले में मांगा था अद्भुत वरदान

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आपने दुनिया में एक से बढ़कर एक महंगी जमीनों के बारे में सुना होगा, लेकिन...क्या आप जानते हैं कि विश्व में आज तक की सबसे महंगी ज़मीन कहाँ पर बिकी है? चित्र : साभार(इंटरनेट) यदि आप सोच रहे हैं कि सबसे महंगी जमीन दुनिया में इंग्लैंड,अमेरिका, स्विट्जरलैंड,फ्रांस या किसी अन्य देश में है, तो आप गलत हैं दुनिया की सबसे महंगी जमीन का सौदा अगर कहीं आज तक हुआ है तो वह हुआ है अपने ही भारत में। विश्व में आज तक भूमि के किसी टुकड़े का सबसे अधिक दाम चुकाया गया है वह है हमारे भारत में...पंजाब में स्थित सिरहिन्द में विश्व की इस सबसे महंगी भूमि को ख़रीदने वाले महान व्यक्ति थे, जिन्हें हम दीवान टोडरमल जी के नाम से जानते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबज़ादों बाबा फ़तह सिंह और बाबा ज़ोरावर सिंह की शहादत की दास्तान शायद आप सबने कभी ना कभी कहीं ना कहीं से सुनी होगी...यहीं सिरहिन्द के फ़तहगढ़ साहिब में मुग़लों के तत्कालीन फ़ौजदार वज़ीर खान ने दोनों साहिबज़ादों को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था. इन्ही के याद में प्रतिवर्ष हम वीर बाल दिवस मनाते हैं। दीवान टोडरमल जी, जो कि इस क्षेत्र ...

यहां खरीदी गई थी दुनिया की सबसे महंगी जमीन,बदले में मांगा था अद्भुत वरदान

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आपने दुनिया में एक से बढ़कर एक महंगी जमीनों के बारे में सुना होगा, लेकिन...क्या आप जानते हैं कि विश्व में आज तक की सबसे महंगी ज़मीन कहाँ पर बिकी है? चित्र : साभार(इंटरनेट) यदि आप सोच रहे हैं कि सबसे महंगी जमीन दुनिया में इंग्लैंड,अमेरिका, स्विट्जरलैंड,फ्रांस या किसी अन्य देश में है, तो आप गलत हैं दुनिया की सबसे महंगी जमीन का सौदा अगर कहीं आज तक हुआ है तो वह हुआ है अपने ही भारत में। विश्व में आज तक भूमि के किसी टुकड़े का सबसे अधिक दाम चुकाया गया है वह है हमारे भारत में...पंजाब में स्थित सिरहिन्द में विश्व की इस सबसे महंगी भूमि को ख़रीदने वाले महान व्यक्ति थे, जिन्हें हम दीवान टोडरमल जी के नाम से जानते हैं। गुरु गोबिंद सिंह जी के छोटे साहिबज़ादों बाबा फ़तह सिंह और बाबा ज़ोरावर सिंह की शहादत की दास्तान शायद आप सबने कभी ना कभी कहीं ना कहीं से सुनी होगी...यहीं सिरहिन्द के फ़तहगढ़ साहिब में मुग़लों के तत्कालीन फ़ौजदार वज़ीर खान ने दोनों साहिबज़ादों को जीवित ही दीवार में चिनवा दिया था. इन्ही के याद में प्रतिवर्ष हम वीर बाल दिवस मनाते हैं। दीवान टोडरमल जी, जो कि इस क्षेत्र ...

संस्कार और आधुनिकता: प्रेरक कथा

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बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था। ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब आर्थिक रूप से स्वतंत्र बेटा पिता के कई बार समझाने पर भी अनसुना कर देता और कहता, "यही तो उम्र है शौक की,खाने पहनने की, जब आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।" बहू खुशबू भी भरे पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी अच्छी थी तो उसके दोस्तों की मंडली भी उसी हिसाब से आधुनिक थी। बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती ..... वो कहता "कमाल करती हो तुम, आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है,मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।" और बहू कहती "क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।" एक दिन अचानक पापा आई. सी. यू...

संस्कार और आधुनिकता: प्रेरक कथा

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बेटा अब खुद कमाने वाला हो गया था ... इसलिए बात-बात पर अपनी माँ से झगड़ पड़ता था। ये वही माँ थी जो बेटे के लिए पति से भी लड़ जाती थी। मगर अब आर्थिक रूप से स्वतंत्र बेटा पिता के कई बार समझाने पर भी अनसुना कर देता और कहता, "यही तो उम्र है शौक की,खाने पहनने की, जब आपकी तरह मुँह में दाँत और पेट में आंत ही नहीं रहेगी तो क्या करूँगा।" बहू खुशबू भी भरे पूरे परिवार से आई थी, इसलिए बेटे की गृहस्थी की खुशबू में रम गई थी। बेटे की नौकरी अच्छी थी तो उसके दोस्तों की मंडली भी उसी हिसाब से आधुनिक थी। बहू को अक्सर वह पुराने स्टाइल के कपड़े छोड़ कर मॉडर्न बनने को कहता, मगर बहू मना कर देती ..... वो कहता "कमाल करती हो तुम, आजकल सारा ज़माना ऐसा करता है,मैं क्या कुछ नया कर रहा हूँ। तुम्हारे सुख के लिए सब कर रहा हूँ और तुम हो कि उन्हीं पुराने विचारों में अटकी हो। क्वालिटी लाइफ क्या होती है तुम्हें मालूम ही नहीं।" और बहू कहती "क्वालिटी लाइफ क्या होती है, ये मुझे जानना भी नहीं है, क्योकि लाइफ की क्वालिटी क्या हो, मैं इस बात में विश्वास रखती हूँ।" एक दिन अचानक पापा आई. सी. यू...