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हिंदी दिवस पर विशेष कविता : भारत के माथे की बिंदी

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फोटो -साभार (इंटरनेट) भारत के माथे की बिंदी,  हिंदी है हम सबकी  हिंदी ।  जिससे अपनी संस्कृति ज़िंदी, हिंदी है वो सबकी  हिंदी॥  भारत के माथे की बिंदी... हिंदी से विज्ञान बना है, हिंदी में इतिहास पला है।  इसकी पावन ऊर्जा से ही संस्कृति का विहान चला है।।   तबलों की थापें हैं, इसमें वीणा के स्वर इसमें समाये ।  सामगान और वेद ऋचायेँ , हिंदी में ही समझी जायेँ ॥ ज्ञान और विज्ञान की कुंजी, हिंदी है हम सबकी  हिंदी । भारत के माथे की बिंदी... बंगाली हो या गुजराती , हिंदी हम सबकी भाषा है।  पंजाबी हो या मदरासी, हिंदी अब सबकी आशा है॥  उत्तर- दक्षिण, पूरब- पश्चिम, एका की ये परिचायक है। एक सूत्र में बांधे सबको,  भारत की उन्नायक है॥  कहे मराठी और कहे सिंधी , हिंदी है हम सबकी  हिंदी।  भारत के माथे की बिंदी... मैकाले के पुत्रों को ये बात समझ में क्यों न आती।  अपने हिंदुस्तान में हिंदी, खून के आँसू क्यों बहाती॥  लानत भेजूँ उन पर मैं जो, हिंदी बोलने में शरमाते।  व्यर्थ हैं वो विद्यालय जिनमें, हिंदी भाषी पीटे जाते॥...

हिंदी दिवस पर विशेष कविता : भारत के माथे की बिंदी

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फोटो -साभार (इंटरनेट) भारत के माथे की बिंदी,  हिंदी है हम सबकी  हिंदी ।  जिससे अपनी संस्कृति ज़िंदी, हिंदी है वो सबकी  हिंदी॥  भारत के माथे की बिंदी... हिंदी से विज्ञान बना है, हिंदी में इतिहास पला है।  इसकी पावन ऊर्जा से ही संस्कृति का विहान चला है।।   तबलों की थापें हैं, इसमें वीणा के स्वर इसमें समाये ।  सामगान और वेद ऋचायेँ , हिंदी में ही समझी जायेँ ॥ ज्ञान और विज्ञान की कुंजी, हिंदी है हम सबकी  हिंदी । भारत के माथे की बिंदी... बंगाली हो या गुजराती , हिंदी हम सबकी भाषा है।  पंजाबी हो या मदरासी, हिंदी अब सबकी आशा है॥  उत्तर- दक्षिण, पूरब- पश्चिम, एका की ये परिचायक है। एक सूत्र में बांधे सबको,  भारत की उन्नायक है॥  कहे मराठी और कहे सिंधी , हिंदी है हम सबकी  हिंदी।  भारत के माथे की बिंदी... मैकाले के पुत्रों को ये बात समझ में क्यों न आती।  अपने हिंदुस्तान में हिंदी, खून के आँसू क्यों बहाती॥  लानत भेजूँ उन पर मैं जो, हिंदी बोलने में शरमाते।  व्यर्थ हैं वो विद्यालय जिनमें, हिंदी भाषी पीटे जाते॥...

हिंदी दिवस पर विशेष कविता : भारत के माथे की बिंदी

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फोटो -साभार (इंटरनेट) भारत के माथे की बिंदी,  हिंदी है हम सबकी  हिंदी ।  जिससे अपनी संस्कृति ज़िंदी, हिंदी है वो सबकी  हिंदी॥  भारत के माथे की बिंदी... हिंदी से विज्ञान बना है, हिंदी में इतिहास पला है।  इसकी पावन ऊर्जा से ही संस्कृति का विहान चला है।।   तबलों की थापें हैं, इसमें वीणा के स्वर इसमें समाये ।  सामगान और वेद ऋचायेँ , हिंदी में ही समझी जायेँ ॥ ज्ञान और विज्ञान की कुंजी, हिंदी है हम सबकी  हिंदी । भारत के माथे की बिंदी... बंगाली हो या गुजराती , हिंदी हम सबकी भाषा है।  पंजाबी हो या मदरासी, हिंदी अब सबकी आशा है॥  उत्तर- दक्षिण, पूरब- पश्चिम, एका की ये परिचायक है। एक सूत्र में बांधे सबको,  भारत की उन्नायक है॥  कहे मराठी और कहे सिंधी , हिंदी है हम सबकी  हिंदी।  भारत के माथे की बिंदी... मैकाले के पुत्रों को ये बात समझ में क्यों न आती।  अपने हिंदुस्तान में हिंदी, खून के आँसू क्यों बहाती॥  लानत भेजूँ उन पर मैं जो, हिंदी बोलने में शरमाते।  व्यर्थ हैं वो विद्यालय जिनमें, हिंदी भाषी पीटे जाते॥...

सरकारी शिक्षा की बदहाल स्थिति : जिम्मेदार कौन?

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( आजकल हम देखते हैं  कि सोशल मीडिया पर अधिकांश समूहों में, समाचार पत्रों की सुर्खियों में,बड़ी-बड़ी सरकारी बैठकों में , गली मौहल्ले के नुक्कड़ों और चाय की दुकानों में  सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर विशेष चिंता प्रदर्शित की जा रही है । सरकारी शिक्षा की वर्तमान स्थिति की पड़ताल करती, सोचने पर मजबूर कर देने वाली   तनुज पंत 'अनंत ' की सटीक टिप्पणी..........)    ( तनुज पंत  ' अनंत '   एक बैंक अधिकारी हैं।   लेखन , पठन-पाठन में रूचि व    साहित्य  के क्षेत्र में प्रभावी दखल रखते हैं.) सुप्रभात मित्रों, जब कभी कापी-पेस्ट और फोटो फॉरवर्ड के इस व्हाटसेपिया बीहड़ में इस प्रकार की गंभीर चर्चा पढ़ने को मिलती है तो लगता है कि ग्रुप बनाने का प्रयोजन सफल हुआ। हमारे यहां सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था वो पतंग है जिसकी डोर निरंतर उलझती जा रही है। विकल्प यह भी है कि डोर काट कर पतंग आजाद कर दी जाये और यह भी, कि डोर सुलझायी जाये। पतंग उड़ायी भी पतंगबाज ने और डोर उलझायी भी पतंगबाज ने। इसमें पतंग का क्या दोष है? अब डोर सुलझाने के झंझट में ना ...

सरकारी शिक्षा की बदहाल स्थिति : जिम्मेदार कौन?

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( आजकल हम देखते हैं  कि सोशल मीडिया पर अधिकांश समूहों में, समाचार पत्रों की सुर्खियों में,बड़ी-बड़ी सरकारी बैठकों में , गली मौहल्ले के नुक्कड़ों और चाय की दुकानों में  सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर विशेष चिंता प्रदर्शित की जा रही है । सरकारी शिक्षा की वर्तमान स्थिति की पड़ताल करती, सोचने पर मजबूर कर देने वाली   तनुज पंत 'अनंत ' की सटीक टिप्पणी..........)    ( तनुज पंत  ' अनंत '   एक बैंक अधिकारी हैं।   लेखन , पठन-पाठन में रूचि व    साहित्य  के क्षेत्र में प्रभावी दखल रखते हैं.) सुप्रभात मित्रों, जब कभी कापी-पेस्ट और फोटो फॉरवर्ड के इस व्हाटसेपिया बीहड़ में इस प्रकार की गंभीर चर्चा पढ़ने को मिलती है तो लगता है कि ग्रुप बनाने का प्रयोजन सफल हुआ। हमारे यहां सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था वो पतंग है जिसकी डोर निरंतर उलझती जा रही है। विकल्प यह भी है कि डोर काट कर पतंग आजाद कर दी जाये और यह भी, कि डोर सुलझायी जाये। पतंग उड़ायी भी पतंगबाज ने और डोर उलझायी भी पतंगबाज ने। इसमें पतंग का क्या दोष है? अब डोर सुलझा...

सरकारी शिक्षा की बदहाल स्थिति : जिम्मेदार कौन?

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( आजकल हम देखते हैं  कि सोशल मीडिया पर अधिकांश समूहों में, समाचार पत्रों की सुर्खियों में,बड़ी-बड़ी सरकारी बैठकों में , गली मौहल्ले के नुक्कड़ों और चाय की दुकानों में  सरकारी स्कूलों की बदहाल स्थिति पर विशेष चिंता प्रदर्शित की जा रही है । सरकारी शिक्षा की वर्तमान स्थिति की पड़ताल करती, सोचने पर मजबूर कर देने वाली   तनुज पंत 'अनंत ' की सटीक टिप्पणी..........)    ( तनुज पंत  ' अनंत '   एक बैंक अधिकारी हैं।   लेखन , पठन-पाठन में रूचि व    साहित्य  के क्षेत्र में प्रभावी दखल रखते हैं.) सुप्रभात मित्रों, जब कभी कापी-पेस्ट और फोटो फॉरवर्ड के इस व्हाटसेपिया बीहड़ में इस प्रकार की गंभीर चर्चा पढ़ने को मिलती है तो लगता है कि ग्रुप बनाने का प्रयोजन सफल हुआ। हमारे यहां सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था वो पतंग है जिसकी डोर निरंतर उलझती जा रही है। विकल्प यह भी है कि डोर काट कर पतंग आजाद कर दी जाये और यह भी, कि डोर सुलझायी जाये। पतंग उड़ायी भी पतंगबाज ने और डोर उलझायी भी पतंगबाज ने। इसमें पतंग का क्या दोष है? अब डोर सुलझाने के झंझट में ना ...

लॉकडाउन में मजदूर

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फोटो-इंटरनेट (साभार) सिर पर बड़ी गठरियाँ लादे , कंधों पर थैले लटकाये। लॉकडाउन का कर उल्लंघन , भीड़ बने , सड़कों पर छाये॥ शौक नहीं , इनको भ्रमण का , न कानून तोड़ना , है मंजूर। लाचार हुए नियति के हाथों , चल रहे निरंतर , ये मजदूर॥ जहाँ हैं , गर वहीं रहे तो , क्या खाएँगे , क्या ये पीयेंगे। काम नहीं , पैसा भी नहीं है , भूखे पेट , कब तलक जीएँगे॥ कौन जाने , कैसे तय होगा , हजारों मील का ये सफर। पेट हैं खाली , पाँवों में छाले , फिर भी सकते नहीं ठहर॥ कुछ तो मरे बीच राह में , कुछ कटे रेल की पटरी पर। जान गंवा दी बेचारों ने , पूरा नहीं , कर सके सफर॥ अच्छी तरह जानते हैं कि , निगल सकती इन्हें बीमारी। पर इनके हालात ही ऐसे , भूख पड़ी , मौत पर भारी॥ दर्द इनका समझ सको तो , आगे आओ , हाथ बढ़ाओ। मदद करो , राहों में इनकी , कुछ तो इनका , कष्ट मिटाओ॥                             ------प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'   (कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन में बेबस ...

लॉकडाउन में मजदूर

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फोटो-इंटरनेट (साभार) सिर पर बड़ी गठरियाँ लादे , कंधों पर थैले लटकाये। लॉकडाउन का कर उल्लंघन , भीड़ बने , सड़कों पर छाये॥ शौक नहीं , इनको भ्रमण का , न कानून तोड़ना , है मंजूर। लाचार हुए नियति के हाथों , चल रहे निरंतर , ये मजदूर॥ जहाँ हैं , गर वहीं रहे तो , क्या खाएँगे , क्या ये पीयेंगे। काम नहीं , पैसा भी नहीं है , भूखे पेट , कब तलक जीएँगे॥ कौन जाने , कैसे तय होगा , हजारों मील का ये सफर। पेट हैं खाली , पाँवों में छाले , फिर भी सकते नहीं ठहर॥ कुछ तो मरे बीच राह में , कुछ कटे रेल की पटरी पर। जान गंवा दी बेचारों ने , पूरा नहीं , कर सके सफर॥ अच्छी तरह जानते हैं कि , निगल सकती इन्हें बीमारी। पर इनके हालात ही ऐसे , भूख पड़ी , मौत पर भारी॥ दर्द इनका समझ सको तो , आगे आओ , हाथ बढ़ाओ। मदद करो , राहों में इनकी , कुछ तो इनका , कष्ट मिटाओ॥                             ------प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'   (कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन में बेबस मजदूरों के हालात पर लिखी गई कविता) पोस्ट पर अपनी राय/सुझाव देने अथवा अधिक जानकारी हेतु यहाँ लिखे...

लॉकडाउन में मजदूर

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फोटो-इंटरनेट (साभार) सिर पर बड़ी गठरियाँ लादे , कंधों पर थैले लटकाये। लॉकडाउन का कर उल्लंघन , भीड़ बने , सड़कों पर छाये॥ शौक नहीं , इनको भ्रमण का , न कानून तोड़ना , है मंजूर। लाचार हुए नियति के हाथों , चल रहे निरंतर , ये मजदूर॥ जहाँ हैं , गर वहीं रहे तो , क्या खाएँगे , क्या ये पीयेंगे। काम नहीं , पैसा भी नहीं है , भूखे पेट , कब तलक जीएँगे॥ कौन जाने , कैसे तय होगा , हजारों मील का ये सफर। पेट हैं खाली , पाँवों में छाले , फिर भी सकते नहीं ठहर॥ कुछ तो मरे बीच राह में , कुछ कटे रेल की पटरी पर। जान गंवा दी बेचारों ने , पूरा नहीं , कर सके सफर॥ अच्छी तरह जानते हैं कि , निगल सकती इन्हें बीमारी। पर इनके हालात ही ऐसे , भूख पड़ी , मौत पर भारी॥ दर्द इनका समझ सको तो , आगे आओ , हाथ बढ़ाओ। मदद करो , राहों में इनकी , कुछ तो इनका , कष्ट मिटाओ॥                             ------प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'   (कोरोना महामारी के चलते लॉकडाउन में बेबस मजदूरों के हालात पर लिखी गई कविता) पोस्ट पर अपनी राय/सुझाव देने अथवा अधिक जानकारी हेतु यहाँ लिखे...

कहाँ कोरोना रोका साहब

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.....प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' फोटो(साभार)-इन्टरनेट  कहाँ कोरोना रोका साहब , देते सबको धोखा साहब। घूम रहे सब खुल्लमखुल्ला , मार रहे हैं चौका साहब।।       पचास केस पर लॉकडाउन था , बंद विलेज और हर टाउन था। गली कूचे सुनसान पड़े थे , शहर भी सब वीरान पड़े थे। अब लाखों में नंबर आया। तो सब कुछ है क्यों खुलवाया। यही बात बस समझ न आए , आखिर क्या है लोचा साहब। कहाँ कोरोना रोका साहब देते सबको धोखा साहब। संक्रमण की बढ़ती दर है , हवा में फैला हुआ जहर है। इतने ज्यादा केस बढ़े हैं , अस्पताल के हाथ खड़े हैं। अब क्यों सब कुछ खोल रहे हो , जीवन को सस्ता तोल रहे हो। सोचो जरा ध्यान लगाकर , संभलो अब भी मौका साहब। कहाँ कोरोना रोका साहब देते सबको धोखा साहब। पोस्ट पर अपनी राय/सुझाव देने अथवा अधिक जानकारी हेतु यहाँ लिखें...

कहाँ कोरोना रोका साहब

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.....प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' फोटो(साभार)-इन्टरनेट कहाँ कोरोना रोका साहब , देते सबको धोखा साहब। घूम रहे सब खुल्लमखुल्ला , मार रहे हैं चौका साहब।। पचास केस पर लॉकडाउन था , बंद विलेज और हर टाउन था। गली कूचे सुनसान पड़े थे , शहर भी सब वीरान पड़े थे। अब लाखों में नंबर आया। तो सब कुछ है क्यों खुलवाया। यही बात बस समझ न आए , आखिर क्या है लोचा साहब। कहाँ कोरोना रोका साहब देते सबको धोखा साहब। संक्रमण की बढ़ती दर है , हवा में फैला हुआ जहर है। इतने ज्यादा केस बढ़े हैं , अस्पताल के हाथ खड़े हैं। अब क्यों सब कुछ खोल रहे हो , जीवन को सस्ता तोल रहे हो। सोचो जरा ध्यान लगाकर , संभलो अब भी मौका साहब। कहाँ कोरोना रोका साहब देते सबको धोखा साहब। प्रदीप बहुगुणा दर्पण</div> </div>

कहाँ कोरोना रोका साहब

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.....प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' फोटो(साभार)-इन्टरनेट कहाँ कोरोना रोका साहब , देते सबको धोखा साहब। घूम रहे सब खुल्लमखुल्ला , मार रहे हैं चौका साहब।। पचास केस पर लॉकडाउन था , बंद विलेज और हर टाउन था। गली कूचे सुनसान पड़े थे , शहर भी सब वीरान पड़े थे। अब लाखों में नंबर आया। तो सब कुछ है क्यों खुलवाया। यही बात बस समझ न आए , आखिर क्या है लोचा साहब। कहाँ कोरोना रोका साहब देते सबको धोखा साहब। संक्रमण की बढ़ती दर है , हवा में फैला हुआ जहर है। इतने ज्यादा केस बढ़े हैं , अस्पताल के हाथ खड़े हैं। अब क्यों सब कुछ खोल रहे हो , जीवन को सस्ता तोल रहे हो। सोचो जरा ध्यान लगाकर , संभलो अब भी मौका साहब। कहाँ कोरोना रोका साहब देते सबको धोखा साहब। प्रदीप बहुगुणा दर्पण</div> </div>