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किशोर संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति: ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण

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देहरादून में 25 अप्रैल को एक भव्य कार्यक्रम में सत्रह वर्षीय कवयित्री सिद्धि भण्डारी के प्रथम कविता संग्रह ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समकालीन साहित्य, किशोर लेखन और रचनात्मकता की दिशा पर गंभीर विमर्श का अवसर भी बना। लेखन: ठहराव का एक रचनात्मक क्षण कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए सिद्धि ने लेखन को एक गहरे आत्मिक अनुभव के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, लिखना महज़ शब्दों को पंक्तिबद्ध करना नहीं है, बल्कि यह जीवन की भागदौड़ के बीच स्वयं से मिलने का एक ठहराव है। आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में मनुष्य अपनी संवेदनाओं, अनुभवों और अवलोकन की क्षमता को खोता जा रहा है। ऐसे में लेखन एक माध्यम बन सकता है, जो हमें अपने भीतर झांकने और दुनिया को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देता है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि हर व्यक्ति की अपनी एक कथा होती है, लेकिन हम उसे समझने और व्यक्त करने की प्रक्रिया से दूर होते जा रहे हैं। उनका मानना है कि यदि हम ठहरकर सोचें, मह...

किशोर संवेदनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति: ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण

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देहरादून में 25 अप्रैल को एक भव्य कार्यक्रम में सत्रह वर्षीय कवयित्री सिद्धि भण्डारी के प्रथम कविता संग्रह ‘नेवर एंडिंग फिक्शन’ का लोकार्पण दून पुस्तकालय एवं शोध केंद्र के सभागार में सम्पन्न हुआ। यह आयोजन केवल एक पुस्तक के विमोचन तक सीमित नहीं रहा, बल्कि समकालीन साहित्य, किशोर लेखन और रचनात्मकता की दिशा पर गंभीर विमर्श का अवसर भी बना। लेखन: ठहराव का एक रचनात्मक क्षण कार्यक्रम में अपनी बात रखते हुए सिद्धि ने लेखन को एक गहरे आत्मिक अनुभव के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, लिखना महज़ शब्दों को पंक्तिबद्ध करना नहीं है, बल्कि यह जीवन की भागदौड़ के बीच स्वयं से मिलने का एक ठहराव है। आज की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में मनुष्य अपनी संवेदनाओं, अनुभवों और अवलोकन की क्षमता को खोता जा रहा है। ऐसे में लेखन एक माध्यम बन सकता है, जो हमें अपने भीतर झांकने और दुनिया को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देता है। उन्होंने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि हर व्यक्ति की अपनी एक कथा होती है, लेकिन हम उसे समझने और व्यक्त करने की प्रक्रिया से दूर होते जा रहे हैं। उनका मानना है कि यदि हम ठहरकर सोचें, मह...

धराली की पीड़ा पर श्रुति की मार्मिक कविता

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फोटो साभार: इंटरनेट     धराली की पीड़ा पर... मेरे शब्द जैसे मौन से हो गए हैं। धराली की धड़कनों के साथ, वो भी कहीं खो गए हैं । लोगों की चीखें, रुदन की आवाजें, दिल दहला देने वाले वो मंज़र आंखों के सामने हैं। जिनकी तलाश है, वो कहीं भी दिख नहीं रहे हैं। रो रही है हर वो आंख , जो थाल सजा कर बैठी थी। सूनी रहेगी हर वो कलाई, जिसे रक्षाबंधन का इंतजार था। कहां गई वो जीवट, जो धराली की धड़कनों में कहीं बसती थी? क्या सोचा होगा उन धड़कनों ने, कि ये सैलाब उन्हें कहां ले जाएगा? घर की दहलीज से उठाकर मौत के दरवाज़े पर छोड़ आएगा । कितने रिश्ते पल भर में आई उस बाढ़ में बह गए। लोग दूर- दूर से चिल्लाते, बस चिल्लाते ही रह गए। कितने रिश्तों में उलझनें रही होंगी कोई सुबह लड़ा होगा तो,दिन में माफ़ी मांगने के लिए झुका होगा। सोचो सब कुछ मिट्टी में कैसे आज भी दफन होगा। आज भी उस मलबे के भीतर, उन दीवारों में शोर होगा। मां गंगा की गोद में सोकर भी उसे अफसोस तो होगा, क्योंकि कौन चाहता है अपनों से दूर होना आज उन बची धड़कनों के मन में सवालों का ज़ोर होगा क्या कहूं? कैसे कहूं ? जो ये सब हुआ। उसे कैसे मैं शब्दों में बया...

धराली की पीड़ा पर श्रुति की मार्मिक कविता

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फोटो साभार: इंटरनेट     धराली की पीड़ा पर... मेरे शब्द जैसे मौन से हो गए हैं। धराली की धड़कनों के साथ, वो भी कहीं खो गए हैं । लोगों की चीखें, रुदन की आवाजें, दिल दहला देने वाले वो मंज़र आंखों के सामने हैं। जिनकी तलाश है, वो कहीं भी दिख नहीं रहे हैं। रो रही है हर वो आंख , जो थाल सजा कर बैठी थी। सूनी रहेगी हर वो कलाई, जिसे रक्षाबंधन का इंतजार था। कहां गई वो जीवट, जो धराली की धड़कनों में कहीं बसती थी? क्या सोचा होगा उन धड़कनों ने, कि ये सैलाब उन्हें कहां ले जाएगा? घर की दहलीज से उठाकर मौत के दरवाज़े पर छोड़ आएगा । कितने रिश्ते पल भर में आई उस बाढ़ में बह गए। लोग दूर- दूर से चिल्लाते, बस चिल्लाते ही रह गए। कितने रिश्तों में उलझनें रही होंगी कोई सुबह लड़ा होगा तो,दिन में माफ़ी मांगने के लिए झुका होगा। सोचो सब कुछ मिट्टी में कैसे आज भी दफन होगा। आज भी उस मलबे के भीतर, उन दीवारों में शोर होगा। मां गंगा की गोद में सोकर भी उसे अफसोस तो होगा, क्योंकि कौन चाहता है अपनों से दूर होना आज उन बची धड़कनों के मन में सवालों का ज़ोर होगा क्या कहूं? कैसे कहूं ? जो ये सब हुआ। उसे कैसे मैं शब्दों में बया...

सोचने पर मजबूर कर देगी विरेंद्र नौडियाल की ये कविता... हम गोल गोल घूमे

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हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... लहलहाती फसलें हमारी नस्लें माटी की महक पंक्षियों की चहक बरगद की छांव वो चौपाल चबूतरे हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... साग-सब्जी का स्वाद, गोबर की खाद धारों स्रोतों का पानी, अल्हड़ जवानी खेतों की मेहनत वो रोटी की जुगत हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... हुलेरों का टोला रीति रिवाजों का मेला हक्कारों की पुकार हल्कारों से गुहार चिट्ठी पत्री आना वो पढ़कर सुनाना हम गोल गोल घूमे गूगल हो गए... मेलों की रंगत स्वांगों की झलकी विवाहों के कारज बहिनों की डोली जात यात्रा में जाना वो जयकारे लगाना हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... चारागाह जाना मवेशी चुगाना बुजुर्गों की सेवा आशीष पाना यारों की टोली वो पैदल स्कूल जाना हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... संयुक्त परिवार के खट्टे मीठे एहसास छुट्टियों की प्रतीक्षा रिश्तेदारी में जाना नानी दादी का वो चवन्नी अठन्नी मिलना हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... कवि परिचय: विरेंद्र कुमार नौडियाल 'धीरज' केंद्रीय विद्यालय,भा.ति.सी.पु. (प्रथम पाली)  सीमाद्वार, देहरादून में भौतिक विज्ञान के स्नातकोत्तर शिक्षक हैं। भौतिक विज्ञान पर डिजि...

सोचने पर मजबूर कर देगी विरेंद्र नौडियाल की ये कविता... हम गोल गोल घूमे

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हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... लहलहाती फसलें हमारी नस्लें माटी की महक पंक्षियों की चहक बरगद की छांव वो चौपाल चबूतरे हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... साग-सब्जी का स्वाद, गोबर की खाद धारों स्रोतों का पानी, अल्हड़ जवानी खेतों की मेहनत वो रोटी की जुगत हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... हुलेरों का टोला रीति रिवाजों का मेला हक्कारों की पुकार हल्कारों से गुहार चिट्ठी पत्री आना वो पढ़कर सुनाना हम गोल गोल घूमे गूगल हो गए... मेलों की रंगत स्वांगों की झलकी विवाहों के कारज बहिनों की डोली जात यात्रा में जाना वो जयकारे लगाना हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... चारागाह जाना मवेशी चुगाना बुजुर्गों की सेवा आशीष पाना यारों की टोली वो पैदल स्कूल जाना हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... संयुक्त परिवार के खट्टे मीठे एहसास छुट्टियों की प्रतीक्षा रिश्तेदारी में जाना नानी दादी का वो चवन्नी अठन्नी मिलना हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए... कवि परिचय: विरेंद्र कुमार नौडियाल 'धीरज' केंद्रीय विद्यालय,भा.ति.सी.पु. (प्रथम पाली)  सीमाद्वार, देहरादून में भौतिक विज्ञान के स्नातकोत्तर शिक्षक हैं। भौतिक विज्ञान पर डिजि...

श्रीदेव सुमन पुण्यतिथि पर विशेष: नरेश रावत की कविता...

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                              “श्री देव सुमन” 25 मई 1916 को,चम्बा के जौल गांव में जन्मा हरीराम बडोनी और तारा देवी का सुपुत्र चार भाई - बहनों में सबसे छोटा नाम श्री दत्त था कहलाया। (पिता के बारे में....) पिता थे एक वैद्य...ख्याति थी दूर-दूर तक फैला था.. हैजा का प्रकोप जब लोगों की सेवा में किया खुद को तत्पर था ना चिंता की खुद की...वैद्य धर्म को ही सर्वोच्च माना दुर्भाग्य से आए थे चपेट में इसके... और हुई असम्यक मृत्यु थी| बालक श्री दत्त के सर से.... साया पिता का जो गया बचपन में ही संघर्षों का...मानो पहाड़ आ खड़ा हुआ लेकिन बालक श्री दत्त ने, पिता के सिद्धांतों का... ना कभी विस्मरण किया उनके पद चिन्हों पर चलने का...  सदा ही प्रयास किया। प्रारंभिक शिक्षा हुई गांव में उच्च शिक्षा के लिए जाना...देहरादून पड़ा और यही से ही... राष्ट्र और राष्ट्रीयता के भावों का ह्रदय में...संचार हुआ लेखनी को बनाया... हथियार अपना "सुमन सौरभ" नामक काव्या का संकलन किया नाम तभी से...श्री दत्त से श्री सुमन हुआ। डांडी मार्च में लिया भाग...तो 14 दिन का... हुआ कारावास था वापस जब "रियासत-ए- टि...

श्रीदेव सुमन पुण्यतिथि पर विशेष: नरेश रावत की कविता...

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                              “श्री देव सुमन” 25 मई 1916 को,चम्बा के जौल गांव में जन्मा हरीराम बडोनी और तारा देवी का सुपुत्र चार भाई - बहनों में सबसे छोटा नाम श्री दत्त था कहलाया। (पिता के बारे में....) पिता थे एक वैद्य...ख्याति थी दूर-दूर तक फैला था.. हैजा का प्रकोप जब लोगों की सेवा में किया खुद को तत्पर था ना चिंता की खुद की...वैद्य धर्म को ही सर्वोच्च माना दुर्भाग्य से आए थे चपेट में इसके... और हुई असम्यक मृत्यु थी| बालक श्री दत्त के सर से.... साया पिता का जो गया बचपन में ही संघर्षों का...मानो पहाड़ आ खड़ा हुआ लेकिन बालक श्री दत्त ने, पिता के सिद्धांतों का... ना कभी विस्मरण किया उनके पद चिन्हों पर चलने का...  सदा ही प्रयास किया। प्रारंभिक शिक्षा हुई गांव में उच्च शिक्षा के लिए जाना...देहरादून पड़ा और यही से ही... राष्ट्र और राष्ट्रीयता के भावों का ह्रदय में...संचार हुआ लेखनी को बनाया... हथियार अपना "सुमन सौरभ" नामक काव्या का संकलन किया नाम तभी से...श्री दत्त से श्री सुमन हुआ। डांडी मार्च में लिया भाग...तो 14 दिन का... हुआ कारावास था वापस जब "रियासत-ए- टि...

इस आयोजन में स्त्री अस्मिता के सवालों से निरुत्तर कर गया नाटक, महिला चित्रकारों के चित्रों ने किया मंत्रमुग्ध

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अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस संबंधी कार्यक्रम का आयोजन देहरादून में तरला आमवाला स्थित कैंपस में किया गया। देहरादून की प्रसिद्ध महिला चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी डीआरडीओ की वैज्ञानिक जया मिश्रा तथा डीएवी महाविद्यालय कि छात्र संघ उपाध्यक्ष सोलानी लेगी से बातचीत और संभव मंच परिवार द्वारा नाटक ' तुम रहोगी तो वही' की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। चित्र प्रदर्शनी का आयोजन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है इस दिन होली का त्यौहार होने के कारण अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा इस कार्यक्रम को आज आयोजित किया गया। कार्यक्रम के पहले भाग में देहरादून की प्रसिद्ध महिला चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। प्रदर्शनी के साथ-साथ महिला अधिकारों के संबंध में एक पोस्टर गैलरी भी सुसज्जित की गई थी। चित्र प्रदर्शनी में कृतिका थापा, अनिला सिद्दीकी, हरमनजीत कौर प्रभा, शालिनी रात्रा जैसे चित्रकारों के चित्र प्रदर्शित किए गए।सभी चित्र दर्शकों के मन को छू लेने वाले थे। जेंडर समता पर बातचीत ...

इस आयोजन में स्त्री अस्मिता के सवालों से निरुत्तर कर गया नाटक, महिला चित्रकारों के चित्रों ने किया मंत्रमुग्ध

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अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा आयोजित अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस संबंधी कार्यक्रम का आयोजन देहरादून में तरला आमवाला स्थित कैंपस में किया गया। देहरादून की प्रसिद्ध महिला चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी डीआरडीओ की वैज्ञानिक जया मिश्रा तथा डीएवी महाविद्यालय कि छात्र संघ उपाध्यक्ष सोलानी लेगी से बातचीत और संभव मंच परिवार द्वारा नाटक ' तुम रहोगी तो वही' की प्रस्तुति ने कार्यक्रम में चार चांद लगा दिए। चित्र प्रदर्शनी का आयोजन अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को मनाया जाता है इस दिन होली का त्यौहार होने के कारण अजीम प्रेमजी फाउंडेशन द्वारा इस कार्यक्रम को आज आयोजित किया गया। कार्यक्रम के पहले भाग में देहरादून की प्रसिद्ध महिला चित्रकारों के चित्रों की प्रदर्शनी का आयोजन किया गया। प्रदर्शनी के साथ-साथ महिला अधिकारों के संबंध में एक पोस्टर गैलरी भी सुसज्जित की गई थी। चित्र प्रदर्शनी में कृतिका थापा, अनिला सिद्दीकी, हरमनजीत कौर प्रभा, शालिनी रात्रा जैसे चित्रकारों के चित्र प्रदर्शित किए गए।सभी चित्र दर्शकों के मन को छू लेने वाले थे। जेंडर समता पर बातचीत ...

गांधी जी की याद में पंकज बिजल्वाण की कविता...

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गांधी तेरे पदचिन्हों को, वक्त ने मिटा डाला था, आज तेरी स्मृतियों का भी, हमने कत्ल कर डाला है। तुमने पाठ पढ़ाया अहिंसा का हम हिंसा के पुजारी बन बैठे, तुमने गरल पिया क्रोध का हम रक्तपिपासु बन बैठे। तुमने विश्व पिरोया एक सूत्र मे हम गज भर भूमि को लड़ बैठे, तुमने सन्देश दिया भाईचारे का हम हिन्दू-मुस्लिम बन बैठे। भाषा, मजहब, सम्प्रदाय का हमने आडम्बर रच डाला है। आज तेरी स्मृतियों का भी हमने कत्ल कर डाला है।। तुमने तजे वस्त्र औरों के लिये और हम दुःशासन बन बैठे, तुमने सपना देखा राम-राज्य का हम सब रावण बन बैठे। तुम थे मानवता के रक्षक और हम भक्षक बन बैठे, तुमने आलोकित किया जिस भूखंड को हम उस पर कालिख बन बैठे। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को हमने विस्मृत कर डाला है, आज तेरी स्मृतियों का भी हमने क़त्ल कर डाला है। खून बहा कहीं सिंदूर बहा कहीं जली आवरू की होली, छीन छीन कर मेंहदी का रंग सजाते रहे हम रंगोली। पश्चाताप नही होता हमको हम भावशून्य हो बैठे है, गांधी तेरे देश के इंसा अब हैवान बन बैठे है। इस मजहबी उन्माद मे तेरा ही घर जला डाला है, आज तेरी स्मृतियों का भी हमने कत्ल कर डाला है। ... पंकज...

गांधी जी की याद में पंकज बिजल्वाण की कविता...

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गांधी तेरे पदचिन्हों को, वक्त ने मिटा डाला था, आज तेरी स्मृतियों का भी, हमने कत्ल कर डाला है। तुमने पाठ पढ़ाया अहिंसा का हम हिंसा के पुजारी बन बैठे, तुमने गरल पिया क्रोध का हम रक्तपिपासु बन बैठे। तुमने विश्व पिरोया एक सूत्र मे हम गज भर भूमि को लड़ बैठे, तुमने सन्देश दिया भाईचारे का हम हिन्दू-मुस्लिम बन बैठे। भाषा, मजहब, सम्प्रदाय का हमने आडम्बर रच डाला है। आज तेरी स्मृतियों का भी हमने कत्ल कर डाला है।। तुमने तजे वस्त्र औरों के लिये और हम दुःशासन बन बैठे, तुमने सपना देखा राम-राज्य का हम सब रावण बन बैठे। तुम थे मानवता के रक्षक और हम भक्षक बन बैठे, तुमने आलोकित किया जिस भूखंड को हम उस पर कालिख बन बैठे। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना को हमने विस्मृत कर डाला है, आज तेरी स्मृतियों का भी हमने क़त्ल कर डाला है। खून बहा कहीं सिंदूर बहा कहीं जली आवरू की होली, छीन छीन कर मेंहदी का रंग सजाते रहे हम रंगोली। पश्चाताप नही होता हमको हम भावशून्य हो बैठे है, गांधी तेरे देश के इंसा अब हैवान बन बैठे है। इस मजहबी उन्माद मे तेरा ही घर जला डाला है, आज तेरी स्मृतियों का भी हमने कत्ल कर डाला है। ... पंकज...

Poem On Gandhi Jayanti गाँधी,शास्त्री जयंती पर कवि शलभ की विशेष कविता...

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गाँधी, शास्त्री जयंती  पर  विशेष कविता आओ बच्चों हम सब मिलकर, ऐसी अलख जगा जाएं, बापू के सपनों सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। मिटे गरीबी, भूख देश से, बेकारी भी मिट जाए, सब हाथों को काम मिले और, पेट सभी के भर जाएं, अपनी मेहनत से धरती के, गर्भ से सोना उपजाएं, बापू के सपनों सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। बेईमानों के हाथों में, बेंचे ना ईमान कोई, कभी किसी लालच में आकर, बदले ना इंसान कोई, निष्ठा और समर्पण के गुण, सबके दिल में भर जाएं, बापू के सपनों सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। सत्य के पथ पर चले सभी पर, झूठ कभी ना अपनाएं, छोटे लाभों को पाने को, गलत राह पर ना जाएं, अटल सत्य के आगे देखो, झूठ के पांव न जम पाएं, बापू के सपनों का सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। जात-पात और ऊंच-नीच का, भेद नहीं दिल में पालें, निवलों असहायों को अपने, दिल से हम सब अपना लें, रहें सदा सबसे हिल मिलकर, सबको गले लगा जाएं, बापू के सपनों से सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। भ्रष्टाचार मिटा देंगे हम, अपने देश के दामन से, रिश्वतखोरी का पौधा जब, उखड़े देश के आंगन से, सकल विश्व में भारत माता, अपने तेज को बिखराएं, बापू के स...

Poem On Gandhi Jayanti गाँधी,शास्त्री जयंती पर कवि शलभ की विशेष कविता...

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गाँधी, शास्त्री जयंती  पर  विशेष कविता आओ बच्चों हम सब मिलकर, ऐसी अलख जगा जाएं, बापू के सपनों सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। मिटे गरीबी, भूख देश से, बेकारी भी मिट जाए, सब हाथों को काम मिले और, पेट सभी के भर जाएं, अपनी मेहनत से धरती के, गर्भ से सोना उपजाएं, बापू के सपनों सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। बेईमानों के हाथों में, बेंचे ना ईमान कोई, कभी किसी लालच में आकर, बदले ना इंसान कोई, निष्ठा और समर्पण के गुण, सबके दिल में भर जाएं, बापू के सपनों सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। सत्य के पथ पर चले सभी पर, झूठ कभी ना अपनाएं, छोटे लाभों को पाने को, गलत राह पर ना जाएं, अटल सत्य के आगे देखो, झूठ के पांव न जम पाएं, बापू के सपनों का सा सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। जात-पात और ऊंच-नीच का, भेद नहीं दिल में पालें, निवलों असहायों को अपने, दिल से हम सब अपना लें, रहें सदा सबसे हिल मिलकर, सबको गले लगा जाएं, बापू के सपनों से सुंदर, भारतवर्ष बना जाएं। भ्रष्टाचार मिटा देंगे हम, अपने देश के दामन से, रिश्वतखोरी का पौधा जब, उखड़े देश के आंगन से, सकल विश्व में भारत माता, अपने तेज को बिखराएं, बापू के स...

वर्तमान हालात पर सटीक टिप्पणी। ये क्षणिकाएं हो रही हैं वायरल...

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भ्रष्टाचार भाई भतीजावाद के इस वर्तमान दौर में प्रस्तुत हैं...प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'की ये क्षणिकाएं ... पढ़िए पसंद आने पर शेयर जरूर कीजिएगा... भ्रष्टाचार! हमारा विशेषाधिकार। चुनाव जीते हैं भई, हम हाकम, हम ही सरकार।। रोजगार! हमारे रिश्तेदार। उनका विशेषाधिकार, फिर क्यों हाहाकार।। पत्रकार ! लोकतंत्र के पहरेदार? हो गई क्यों कुंद, कलम की धार।। ... प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' कवि परिचय: प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' देहरादून, उत्तराखंड शिक्षा: एम.एस. सी.(भौतिकी),एम.ए.(हिंदी, शिक्षाशास्त्र), बी.एड. सम्प्रति: प्रवक्ता(भौतिकी), माध्यमिक शिक्षा विभाग उत्तराखंड लेखन: 'आवाज' व 'दो कदम' साझा काव्य संग्रह, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख, व्यंग्य व कविताएं, 21वीं सदी के श्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय व्यंग्यकारों में शामिल, उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा विभाग की पाठ्य पुस्तकों व शिक्षक प्रशिक्षण साहित्य का लेखन व सम्पादन, रूम टू रीड संस्था हेतु बाल कहानी लेखन सम्पादन: बुनियाद तथा अंकुर पत्रिकाओं का सम्पादन, शैक्षिक दखल पत्रिका में सम्पादन सहयोग। प्रसारण: आकाशवाणी और दूरदर...

वर्तमान हालात पर सटीक टिप्पणी। ये क्षणिकाएं हो रही हैं वायरल...

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भ्रष्टाचार भाई भतीजावाद के इस वर्तमान दौर में प्रस्तुत हैं...प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'की ये क्षणिकाएं ... पढ़िए पसंद आने पर शेयर जरूर कीजिएगा... भ्रष्टाचार! हमारा विशेषाधिकार। चुनाव जीते हैं भई, हम हाकम, हम ही सरकार।। रोजगार! हमारे रिश्तेदार। उनका विशेषाधिकार, फिर क्यों हाहाकार।। पत्रकार ! लोकतंत्र के पहरेदार? हो गई क्यों कुंद, कलम की धार।। ... प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' कवि परिचय: प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' देहरादून, उत्तराखंड शिक्षा: एम.एस. सी.(भौतिकी),एम.ए.(हिंदी, शिक्षाशास्त्र), बी.एड. सम्प्रति: प्रवक्ता(भौतिकी), माध्यमिक शिक्षा विभाग उत्तराखंड लेखन: 'आवाज' व 'दो कदम' साझा काव्य संग्रह, विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में लेख, व्यंग्य व कविताएं, 21वीं सदी के श्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय व्यंग्यकारों में शामिल, उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा विभाग की पाठ्य पुस्तकों व शिक्षक प्रशिक्षण साहित्य का लेखन व सम्पादन, रूम टू रीड संस्था हेतु बाल कहानी लेखन सम्पादन: बुनियाद तथा अंकुर पत्रिकाओं का सम्पादन, शैक्षिक दखल पत्रिका में सम्पादन सहयोग। प्रसारण: आकाशवाणी और दूरदर...

kya nam dun| क्या नाम दूँ : तनुज पंत 'अनंत ' की भावपूर्ण कविता

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......क्या नाम दूँ तुम जो गुजरी हो सरसराती पवन सी हृदय स्पंदित करती प्रकाश पुंज सी रेखा खींचती, मन चाहता है तुम्हें सम्मान दूँ , परन्तु किस नाम से पुकारूँ तुम्हें क्या नाम दूँ ? वो ललाट का तेज़ लहलहाते केश स्वयं रति आयी हो जैसे बदल कर भेष। चेहरे की रक्तिम लाली, क्या क्षितिज से उतारी है? वो कमान सी भौहें क्या इंद्रधनुष की परछाई हैं? पलकें खुले तो दामिनी सी कौंधती है। कामिनी तुम- दामिनी तुम, तुम्हें कितने उपनाम दूँ ? किस नाम से पुकारूं तुम्हें क्या नाम दूँ ? तुम खिलखिलाती हो तो बहार सी आ जाती है चलती हो ऐसे, ज्यों नागिन बल खाती है। शाइस्तगी देखूँ तुम्हारी तो राजकुमारी सी लगती हो, या कोई मेनका-रम्भा धरा पर उतरी हो? तुम्हारे गुजरने के बाद रह जाती है एक अपूरणीय शून्यता, मन को सालता, बेचैन करता अजीब सा सन्नाटा। अनायास बेमौसम पतझड़ सा लगता है, पक्षियों का कलरव नदी की कलकल शोर सा लगता है। मन ही मन घुटता रहूँ, या विचारों को जुबान दूँ ? किस नाम से पुकारूँ तुम्हें क्या नाम दूँ ? एक अजीब सा रिश्ता बांध गयी तुम, जीवन पर जैसे छा गई तुम, सोने में तुम जागने में तुम वो नींदों में बड़बड़ाने ...

kya nam dun| क्या नाम दूँ : तनुज पंत 'अनंत ' की भावपूर्ण कविता

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......क्या नाम दूँ तुम जो गुजरी हो सरसराती पवन सी हृदय स्पंदित करती प्रकाश पुंज सी रेखा खींचती, मन चाहता है तुम्हें सम्मान दूँ , परन्तु किस नाम से पुकारूँ तुम्हें क्या नाम दूँ ? वो ललाट का तेज़ लहलहाते केश स्वयं रति आयी हो जैसे बदल कर भेष। चेहरे की रक्तिम लाली, क्या क्षितिज से उतारी है? वो कमान सी भौहें क्या इंद्रधनुष की परछाई हैं? पलकें खुले तो दामिनी सी कौंधती है। कामिनी तुम- दामिनी तुम, तुम्हें कितने उपनाम दूँ ? किस नाम से पुकारूं तुम्हें क्या नाम दूँ ? तुम खिलखिलाती हो तो बहार सी आ जाती है चलती हो ऐसे, ज्यों नागिन बल खाती है। शाइस्तगी देखूँ तुम्हारी तो राजकुमारी सी लगती हो, या कोई मेनका-रम्भा धरा पर उतरी हो? तुम्हारे गुजरने के बाद रह जाती है एक अपूरणीय शून्यता, मन को सालता, बेचैन करता अजीब सा सन्नाटा। अनायास बेमौसम पतझड़ सा लगता है, पक्षियों का कलरव नदी की कलकल शोर सा लगता है। मन ही मन घुटता रहूँ, या विचारों को जुबान दूँ ? किस नाम से पुकारूँ तुम्हें क्या नाम दूँ ? एक अजीब सा रिश्ता बांध गयी तुम, जीवन पर जैसे छा गई तुम, सोने में तुम जागने में तुम वो नींदों में बड़बड़ाने ...

Poem on teacher day in hindi|शिक्षक दिवस पर विशेष ...

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हे शिक्षक तुम संस्कृति वाहक, तुम ही तो राष्ट्र-निर्माता हो। ज्ञान का दीप जलाने वाले, तुम मानव भाग्य विधाता हो ।। चाणक्य, द्रोण और कृपाचार्य के रूप में अमर तुम्हारा इतिहास। तुम चाहो तो समाज बदल दो, करके केवल एक लघु प्रयास॥ </strong> </pre> <!-- /wp:preformatted --> जीवन कितनों का है संवारा, तुमने अपना विद्या-बल देकर । वीर शिवा, राणा और चन्द्रगुप्त, बने महान तव संबल पाकर ।। भवनों की ऊँचाई को नापने वाले, देखते नहीं नींव के पत्थर को । ऐसे ही नहीं जान सकता कोई तेरे अति विराट शक्ति स्तर को॥ </strong> </pre> <!-- /wp:preformatted --> किंतु नींव के पत्थर पर ही, अडिग खड़ा होता है ताजमहल। ऐसे ही तुम पर समाज टिका है, कर्तव्य पथ पर जब हो अविचल ।। ........प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'</strong> </pre> <!-- /wp:preformatted -->

Poem on teacher day in hindi|शिक्षक दिवस पर विशेष ...

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हे शिक्षक तुम संस्कृति वाहक, तुम ही तो राष्ट्र-निर्माता हो। ज्ञान का दीप जलाने वाले, तुम मानव भाग्य विधाता हो ।। चाणक्य, द्रोण और कृपाचार्य के रूप में अमर तुम्हारा इतिहास। तुम चाहो तो समाज बदल दो, करके केवल एक लघु प्रयास॥ </strong> </pre> <!-- /wp:preformatted --> जीवन कितनों का है संवारा, तुमने अपना विद्या-बल देकर । वीर शिवा, राणा और चन्द्रगुप्त, बने महान तव संबल पाकर ।। भवनों की ऊँचाई को नापने वाले, देखते नहीं नींव के पत्थर को । ऐसे ही नहीं जान सकता कोई तेरे अति विराट शक्ति स्तर को॥ </strong> </pre> <!-- /wp:preformatted --> किंतु नींव के पत्थर पर ही, अडिग खड़ा होता है ताजमहल। ऐसे ही तुम पर समाज टिका है, कर्तव्य पथ पर जब हो अविचल ।। ........प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'</strong> </pre> <!-- /wp:preformatted -->