सोचने पर मजबूर कर देगी विरेंद्र नौडियाल की ये कविता... हम गोल गोल घूमे

Ham gol gol ghoome poem of virendra naudiyal
हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए...

लहलहाती फसलें हमारी नस्लें
माटी की महक पंक्षियों की चहक
बरगद की छांव वो चौपाल चबूतरे
हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए...

साग-सब्जी का स्वाद, गोबर की खाद
धारों स्रोतों का पानी, अल्हड़ जवानी
खेतों की मेहनत वो रोटी की जुगत
हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए...

हुलेरों का टोला रीति रिवाजों का मेला
हक्कारों की पुकार हल्कारों से गुहार
चिट्ठी पत्री आना वो पढ़कर सुनाना
हम गोल गोल घूमे गूगल हो गए...
मेलों की रंगत स्वांगों की झलकी
विवाहों के कारज बहिनों की डोली
जात यात्रा में जाना वो जयकारे लगाना
हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए...

चारागाह जाना मवेशी चुगाना
बुजुर्गों की सेवा आशीष पाना
यारों की टोली वो पैदल स्कूल जाना
हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए...

संयुक्त परिवार के खट्टे मीठे एहसास
छुट्टियों की प्रतीक्षा रिश्तेदारी में जाना
नानी दादी का वो चवन्नी अठन्नी मिलना
हम गोल गोल घूमे, गूगल हो गए...

कवि परिचय:

विरेंद्र कुमार नौडियाल 'धीरज' केंद्रीय विद्यालय,भा.ति.सी.पु. (प्रथम पाली)  सीमाद्वार, देहरादून में भौतिक विज्ञान के स्नातकोत्तर शिक्षक हैं। भौतिक विज्ञान पर डिजिटल शिक्षण सामग्री तैयार करने के साथ -साथ आप साहित्य के क्षेत्र में भी प्रभावी दखल रखते हैं।

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