विजयादशमी विशेष : राम का पता नहीं, पर रावण अभी तक जिंदा है!
--- प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' हर साल दशहरा आता है। मैदान में रावण का पुतला खड़ा किया जाता है। उसके दस सिरों पर बुराई के दस चेहरे चिपका दिए जाते हैं। फिर राम के हाथों अग्निबाण छूटता है, पटाखे फूटते हैं और रावण धू-धू कर जलने लगता है। तालियां बजती हैं, भीड़ खुश होती है और लोग घर लौट जाते हैं। अगले दिन अखबारों में रावण दहन की तस्वीरें छपती हैं। लेकिन एक सवाल है, जो हर साल राख के ढेर से उठकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है—जब रावण हर साल जलाया जाता है, तो वह जिंदा कैसे बच जाता है? और राम आखिर हैं कहां? दरअसल, हमने रावण के पुतले को मैदान में खड़ा करना, प्रतीकात्मक रूप से उसे मारना और जलाना तो सीख लिया है, लेकिन अपने भीतर बैठे रावण को पहचानना नहीं सीखा। हम बुराई के पुतले जलाते हैं, मगर बुराइयों को पालते रहते हैं। रावण अमर नहीं है, बल्कि वास्तव में हम उसे मारने के लिए तैयार ही नहीं हैं। हम चाहते हैं कि दुनिया से बुराई मिट जाए, लेकिन उसकी शुरुआत हमसे न हो। राम और रावण की कथा केवल त्रेतायुग की कहानी नही...