कलम मेरी खामोश नहीं
कलम मेरी खामोश नहीं, ये लिखती नई कहानी है।
इसमें स्याही के बदले मेरी, आंखों वाला पानी है।।
सृजन की सरिता इससे बहती
झूठ नहीं ये सच है कहती।
जीवन के हर सुख-दुख में ये,
कलम सदा संग मेरे रहती॥
ये मेरी सहचरी,मेरी सहेली , मेरे दिल की रानी है।
इसमें स्याही के बदले मेरी ,आंखों वाला पानी है।।
इसने जीना मुझे सिखाया,
सच से परिचय मेरा कराया।
जीवन की सच्चाई लिखाकर,
मुझे कवि इसने ही बनाया।।
मेरे आपके अनुभवों की, ये तस्वीर नूरानी है।
इसमें स्याही के बदले मेरी ,आंखों वाला पानी है।।
कलम कवि का है हथियार,
इसका है सब पर अधिकार।
जीवन के इस महासागर में,
कलम बनी मेरी पतवार।।
अटल इरादों वाली है ये,इसकी चाल तूफानी है।
इसमें स्याही के बदले मेरी ,आंखों वाला पानी है।।
कलम का सौदा कर न सकूँगा,
मैं खुद से धोखा कर न सकूँगा।
इसके सहारे जीता हूँ मैं,
इससे धोखा कर न सकूंगा॥
ये मेरी पहचान है,मेरे गौरव की ये निशानी है।
इसमें स्याही के बदले मेरी ,आंखों वाला पानी है।।
- प्रदीप बहुगुणा ’दर्पण’

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