छात्रों को लोकभाषा से जोड़ने की पहल: डायट देहरादून ने तैयार की जौनसारी भाषा की पाठ्यपुस्तक

छात्रों को लोकभाषा से जोड़ने की शानदार पहल के अंतर्गत  उत्तराखंड प्रदेश के चुनिंदा राजकीय विद्यालयों में अब छात्र जौनसारी भाषा भी पढ़ेंगे। डायट देहरादून में आयोजित एक कार्यशाला में इसके लिए प्रारंभिक  पाठ्य पुस्तक तैयार कर ली गई है।

jaunsaari text book harul developed in diet Dehradun

जौनसारी भाषा प्रवेशिका “हारुल” के  लेखन हेतु चार  दिवसीय कार्यशाला ज़िला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान देहरादून में सम्पन्न हुई।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के अंतर्गत स्थानीय भाषा, में पठन, रचनात्मक अभिव्यक्ति और संस्कृति को प्रोत्साहन देने के उद्देश्य से जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान, देहरादून में 26 नवम्बर से 29 नवम्बर 2025 तक चार दिवसीय लेखन कार्यशाला का सफल आयोजन किया गया। यह कार्यशाला प्राचार्य श्रीमती हेमलता गौड़ तथा कार्यशाला समन्वयक श्री शिशुपाल सिंह बिष्ट एवं श्रीमती मृणाल सनवाल के दिशा-निर्देशन में संचालित हुई।

कार्यशाला का मुख्य उद्देश्य विद्यालय स्तर पर विद्यार्थियों में रचनात्मक कौशलों का विकास, सीखने में रुचि का विकास संवर्धन, तथा विलुप्तप्राय होती लोकभाषाओं और लोककला के संरक्षण को बढ़ावा देना था। इसी लक्ष्य के तहत कक्षा 4 और 5 के विद्यार्थियों हेतु जौनसारी लोकभाषा में “हारुल” नामक पुस्तक तैयार करने का कार्य इस कार्यशाला में सम्पन्न किया गया। लोक कला, प्रेरक प्रसंग, धार्मिक स्थल पड़ोसी राज्य और उनकी संस्कृति आदि पर कविताएं, कहानियाँ, एकांकी, पत्र, संवाद, साक्षात्कार, यात्रावृतांत आदि विधाओं में पाठों की रचना की गई ।

इस महत्वपूर्ण कार्य हेतु गठित लेखन मंडल में डॉ. सुरेन्द्र कुमार आर्यन, मंगत राम, डॉ. इंद्रप्रीत कौर, हिमांशु रावत तथा शूरवीर सिंह चौहान शामिल रहे। लेखन मंडल ने जौनसारी लोकभाषा की विशिष्टताओं, शैली, स्थानीय संस्कृति, पर्व-परंपराओं तथा बाल-हितैषी शिक्षण पद्धतियों को ध्यान में रखते हुए पुस्तक की सामग्री का निर्माण किया

समापन सत्र में प्राचार्य एवं समन्वयकों ने लेखन मंडल के सभी सदस्यों का आभार व्यक्त करते हुए कहा कि “हारुल” पुस्तक विद्यार्थियों को अपनी मातृभाषा, लोकजीवन और सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। यह कदम राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के उस लक्ष्य को सशक्त करता है जिसमें स्थानीय भाषा एवं संस्कृति को शिक्षा का आधार बनाने पर बल दिया गया है।

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