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धनतेरस पर विशेष

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धनतेरस पर मातु लक्ष्मी,  , भले ही धन मत बरसाओ। पर किसी  गरीब को माते कभी भूखे पेट ना तरसाओ। ना मिले किसी को नए गहने, ना नई  किसी को कार मिले। पर पेट पालने को अपना, मां सब को रोजगार मिले।। ना जलें पटाखों की लड़ियाँ, न चलें भले ही फुलझड़ियाँ। पर मिटा दो माँ सबके जीवन से, दुःख और लाचारी की घड़ियां।। न रहे कहीं भी कंगाली आये हर घर में खुशहाली। मिटा अंधेरे, हर एक दिल के, माँ मनवा दो, सच्ची दीवाली।     प्रदीप बहुगुणा' दर्पण'

धनतेरस पर विशेष

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धनतेरस पर मातु लक्ष्मी,  , भले ही धन मत बरसाओ। पर किसी  गरीब को माते कभी भूखे पेट ना तरसाओ। ना मिले किसी को नए गहने, ना नई  किसी को कार मिले। पर पेट पालने को अपना, मां सब को रोजगार मिले।। ना जलें पटाखों की लड़ियाँ, न चलें भले ही फुलझड़ियाँ। पर मिटा दो माँ सबके जीवन से, दुःख और लाचारी की घड़ियां।। न रहे कहीं भी कंगाली आये हर घर में खुशहाली। मिटा अंधेरे, हर एक दिल के, माँ मनवा दो, सच्ची दीवाली।     प्रदीप बहुगुणा' दर्पण' पोस्ट पर अपने सुझाव/प्रतिक्रिया देने अथवा अधिक जानकारी हेतु यहाँ लिखें...

धनतेरस पर विशेष

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धनतेरस पर मातु लक्ष्मी,  , भले ही धन मत बरसाओ। पर किसी  गरीब को माते कभी भूखे पेट ना तरसाओ। ना मिले किसी को नए गहने, ना नई  किसी को कार मिले। पर पेट पालने को अपना, मां सब को रोजगार मिले।। ना जलें पटाखों की लड़ियाँ, न चलें भले ही फुलझड़ियाँ। पर मिटा दो माँ सबके जीवन से, दुःख और लाचारी की घड़ियां।। न रहे कहीं भी कंगाली आये हर घर में खुशहाली। मिटा अंधेरे, हर एक दिल के, माँ मनवा दो, सच्ची दीवाली।     प्रदीप बहुगुणा' दर्पण' पोस्ट पर अपने सुझाव/प्रतिक्रिया देने अथवा अधिक जानकारी हेतु यहाँ लिखें...

कुछ लिखा जाता नहीं

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मायने अच्छाई के इस शहर में कुछ और हैं, अच्छा है कि मुझको यहां अच्छा कहा जाता नहीं. सोचता हूं कि चुप रहूं मैं भी उन सबकी तरह, पर देखकर रंगे जमाना चुप रहा जाता नहीं दर्द अपना हो तो मैं चुपचाप सह लूंगा उसे, दर्द बेबस आदमी का पर सहा जाता नहीं... भूख से बच्चे बिलखते बिक रही हैं बेटियां, चैन से दो रोटियां भी कोई खा पाता नहीं . शोर चारों ओर है तो चैन कैसे पाऊंगा मैं , नींद का कतरा नयन में एक ठहर पाता नहीं . मंच पर चढ़्कर वो देखो,खींचते मुझको भी हैं. पर आदमी से हो अलग मुझसे जीया जाता नहीं. चाहता हूँ गीत लिखना मैं भी तो श्रृंगार के. दर्द में डूबी कलम से कुछ लिखा जाता नहीं ....                 .......प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण'

कुछ लिखा जाता नहीं

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मायने अच्छाई के इस शहर में कुछ और हैं, अच्छा है कि मुझको यहां अच्छा कहा जाता नहीं. सोचता हूं कि चुप रहूं मैं भी उन सबकी तरह, पर देखकर रंगे जमाना चुप रहा जाता नहीं दर्द अपना हो तो मैं चुपचाप सह लूंगा उसे, दर्द बेबस आदमी का पर सहा जाता नहीं... भूख से बच्चे बिलखते बिक रही हैं बेटियां, चैन से दो रोटियां भी कोई खा पाता नहीं . शोर चारों ओर है तो चैन कैसे पाऊंगा मैं , नींद का कतरा नयन में एक ठहर पाता नहीं . मंच पर चढ़्कर वो देखो,खींचते मुझको भी हैं. पर आदमी से हो अलग मुझसे जीया जाता नहीं. चाहता हूँ गीत लिखना मैं भी तो श्रृंगार के. दर्द में डूबी कलम से कुछ लिखा जाता नहीं ....                 .......प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' पोस्ट पर अपने सुझाव/प्रतिक्रिया देने अथवा अधिक जानकारी हेतु यहाँ लिखें...

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मायने अच्छाई के इस शहर में कुछ और हैं, अच्छा है कि मुझको यहां अच्छा कहा जाता नहीं. सोचता हूं कि चुप रहूं मैं भी उन सबकी तरह, पर देखकर रंगे जमाना चुप रहा जाता नहीं दर्द अपना हो तो मैं चुपचाप सह लूंगा उसे, दर्द बेबस आदमी का पर सहा जाता नहीं... भूख से बच्चे बिलखते बिक रही हैं बेटियां, चैन से दो रोटियां भी कोई खा पाता नहीं . शोर चारों ओर है तो चैन कैसे पाऊंगा मैं , नींद का कतरा नयन में एक ठहर पाता नहीं . मंच पर चढ़्कर वो देखो,खींचते मुझको भी हैं. पर आदमी से हो अलग मुझसे जीया जाता नहीं. चाहता हूँ गीत लिखना मैं भी तो श्रृंगार के. दर्द में डूबी कलम से कुछ लिखा जाता नहीं ....                 .......प्रदीप बहुगुणा 'दर्पण' पोस्ट पर अपने सुझाव/प्रतिक्रिया देने अथवा अधिक जानकारी हेतु यहाँ लिखें...

लोकतन्त्र का काला सच या जनसेवा की हकीकत

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फोटो -साभार  आज संत रविदास जी की जयंती है। सार्वजनिक अवकाश होने के कारण गुप्ता जी को   कार्यालय   जाने की कोई टेंशन नहीं थी। लंबी तानकर सोने   का मन था। गुप्ता जी का मानना था कि जिंदगी का असली मजा तो सोने में है।   बीबी- बच्चों   से कल   रात ही करबद्ध प्रार्थना कर ली थी कि कृपा   करके सुबह- सुबह डिस्टर्ब न करें। बड़े - बड़े   पुण्यकर्मों के बाद तो   छुट्टी नसीब होती है , सो जी भरकर सो लेने दें ।       सुबह के सात ही बजे थे  ,  कि पत्नी ने झिंझोड़- झिंझोड़ कर जगा दिया। “ अजी ,  उठो न। कब से चिल्ला रही हूँ  ,  इंसान हो या कुंभकर्ण ?” क्या हुआ , क्या बात है ? सुबह- सुबह नींद क्यों खराब कर रही हो।   गुप्ता जी मन हुआ कि चीख- चीखकर आसमान सर पर उठा लें ,  पर एक आम भारतीय पति की तरह मजबूरी में गुस्सा पीने की आदत उन्हें पड़ चुकी थी। अरे ,  रामभरोसे आया है ,  अपना दूधवाला। तो मैं क्या करूँ ?  दूध तो तुमने लेना है न। वो आप से मिलना चाहता है। कोई जरूरी काम है शायद।  ...