श्रीदेव सुमन को क्यों देना पड़ा बलिदान,सुमन की पुण्यतिथि पर विशेष...

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अमर शहीद श्री देव सुमन

हर वर्ष 25 जुलाई को हम महान शहीद श्री देव सुमन की पुण्यतिथि पर उन्हें श्रद्धा सुमन समर्पित करते हैं। सुमन ने अपना बलिदान टिहरी राजशाही के अत्याचारों से लड़ते हुए जनता को मुक्ति दिलाने के लिए दिया था। टिहरी राज्य की स्थापना ही अंग्रेजों के सहयोग से राजा सुदर्शन शाह द्वारा की गई थी।  गोरखाओं के शासन से जनता पहले ही त्रस्त थी, फिर उस पर गोरखों से मुक्ति के बाद राजाओं का विशेष ध्यान ब्रिटिश सरकार की खुशामद व अंग्रेज अफसरों को खुश करने में लगा रहता था। जनता पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध लगा दिए गए थे। गरीब जनता करों के बोझ से त्रस्त थी। इस आलेख में हम जनता पर थोपे गए उन करों के बारे में जानकारी देंगे, जिनकी वजह से श्री देव सुमन को राजशाही के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल फूंकना पड़ा।

औताली -

                किसी पुत्रहीन व्यक्ति की मृत्यु हो जाने पर उसकी सम्पत्ति का अधिग्रहण ‘औताली’ के रूप में राजा द्वारा कर लिया जाता था। ऐसे व्यक्ति को ‘औता’ कहा जाता था, उसकी अविवाहित पुत्रियों व विधवा स्त्री पर भी राज्य का स्वामित्व मान लिया जाता था।

गयाली -

                कोई व्यक्ति यदि अपनी भूमि को छोड़कर किसी अन्य स्थान पर परिवार सहित रहने के लिए चला जाता था तो उस व्यक्ति की भूमि पर भी राजा द्वारा कब्जा कर लिया जाता था। ‘गयाली’ का सम्बन्ध गए हुए व्यक्ति से था।

मुयाली -

                मुयाली का अर्थ मृतक की भूमि से था। यदि किसी व्यक्ति का कोई वारिस नहीं होता था तो उसकी मृत्यु के पश्चात उसकी सम्पत्ति पर राजा का स्वामित्व हो जाता था।

नजराना व दाखिल-खारिज -

                गयाली व मुयाली के रूप में अधिगृहित की गई भूमि पर ‘नजराना’ नामक कर लेकर राजा नजराना देने वाले व्यक्ति को उस भूमि का मौरूसीदार (स्वामी) बना देता था। किसी व्यक्ति की भूमि उसके उत्तराधिकारियों को हस्तांतरित करते समय भी ‘दाखिल-खारिज’ के रूप में कर वसूला जाता था।

देण-खेण -

                यह विशेषकर राज परिवार में कोई शुभ कार्य (विवाह, युवराज के जन्म आदि) के अवसर पर वसूला जाता था। यह कर राजस्व की एक चैथाई अतिरिक्त राशि के रूप में वसूल किया जाता था।

आयात कर -

                राज्य के बाहर से आने वाली वस्तुओं पर राजा द्वारा आयात कर लगाया जाता था। राज्य की सीमाओं के प्रवेश द्वारों पर चुंगी बनी होती थी, जहां कर वसूली के लिए चुंगी मुंशी की नियुक्ति होती थी। यह कर निम्नलिखित तीन श्रेणियों में लिया जाता था -

                (क) अनाज, सब्जी, मछली, गुड़, नमक आदि खाद्य पदार्थों पर आढ़त कर।

                (ख) दैनिक जीवन की वस्तुओं साबुन, तेल, कपड़े, बर्तन, ऊन आदि पर पौण टोंटी कर।

(ग) विलासिता की वस्तुओं तथा बीड़ी सिगरेट आदि पर कर।

निर्यात कर -

                प्राकृतिक एवं वन्य वस्तुओं को राज्य से बाहर ले जाने पर निर्यात कर लगता था।

डोमकर -

                ऊनी वस्त्र, सूती वस्त्र, कम्बल आदि बुनने वाले हरिजनों से भी कर लिया जाता था। इसे डोमकर या मझारी कहा जाता था।

रैका भवन -

                टिहरी रियासत के लोग गंगाजल की कांवड़ लेकर ऋषिकेश-हरिद्वार पहुंचते थे, जहां से यह जल देश के विभिन्न भागों में भेजा जाता था। गंगाजल की बिक्री पर लगने वाला कर ‘रैका भवन’’ कहलाया था।

भूमि कर या लगान -

                सम्पूर्ण रियासत की भूमि का स्वामी राजा को माना जाता था भूमि से उपज प्राप्त करने वाले व्यक्ति को मौरूसीदार कहा जाता था जिस पर निम्नलिखित भूमि कर लगाए जाते थे।

(क) मामला या रकम - नकद राशि के रूप में देय लगान को मामला या रकम कहा जाता था।

(ख) बरा या बिसाही - यह कर अनाज के रूप में वसूला जाता था।

छूट -

                यह तलाक लेने वाले दम्पत्तियों से वसूला जाने वाला कर था।

तूली पाथा रकम -

                वस्तुओं पर बिक्रीकर के रूप में तूलीपाथा रकम लिया जाता था।

जारी -

              व्याभिचारी स्त्री-पुरुषों पर लगाए जाने वाले अर्थदण्ड को जारी कहा जाता था।

चन्द्रायण -

                किसी भी कारण से जाति भ्रष्ट हुए व्यक्ति को शुद्ध होकर पुनः अपनी जाति में शामिल होने के लिए चंद्रायण के रूप में धनराशि जमा करनी पड़ती थी।

                उपरोक्त करों के अतिरिक्त जनता के शोषण के कुछ अन्य तरीके भी थे जिनका संक्षिप्त उल्लेख निम्नवत् है -

पाला-बिसाऊ प्रथा -

                राजा व दरबारियों के लिए बड़ी संख्या में घोड़े-खच्चर, गाय-भैंस आदि रखे जाते थे। राजा के आदेशानुसार इनकी व्यवस्था के लिए प्रत्येक परिवार को प्रतिवर्ष 1 बोझा घास, 4 पाथा चावल, 2 पाथा गेहूँ, एक सेर घी, और एक बकरा स्वयं राजमहल में पहुंचाकर रसीद प्राप्त करनी होती थी। वापस लौटकर वह रसीद अपनी पट्टी के पटवारी को दिखानी पड़ती थी। ऐसा न करने पर दण्ड का प्रावधान था। इस प्रथा को पाला-बिसाउ कहा जाता था।

कुली बेगार या छोटी बर्दायश  -

                इस प्रथा के अंतर्गत दरबारियों, अंग्रेज मेहमानों व रियासत के अतिथियों का सामान ढोने, उनके बच्चों, मुर्गी एवं कुत्तों तक को पालकी में ले जाने के लिए प्रजाजनों को बाध्य होना पड़ता था। इसके लिए उन्हें मुफ्त में सेवा करनी पड़ती थी।

बड़ी बर्दायश या प्रभुसेवा -

                यह प्रथा भी छोटी बर्दायश की तरह ही थी लेकिन यह केवल राजा, राजपरिवार के सदस्यों व पाॅलिटिकल एजेण्टों के आवागमन के समय लागू होती थी।जिसमें लोगों को बेगार करना पड़ता था।

अब आप समझ सकते हैं कि जनता पर करों का कितना अधिक बोझ था, और किस- किस तरह के अमानवीय और अप्रासंगिक कर तत्कालीन शासन ने लगाए थे। इन करों के चलते जनता की कमर आर्थिक रूप से बिलकुल टूट गई। श्री देव सुमन के संघर्ष का एक प्रमुख कारण जनता को कराधान के इस अत्याचार से मुक्ति दिलाना भी था।

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लेख के बारे में :

यह आलेख डॉ. अनीता बहुगुणा के शोध प्रबंध "श्री देव सुमन पर रचित साहित्य में चित्रित उनका युग तथा जीवन" पर आधारित है। डॉ. अनीता बहुगुणा माध्यमिक शिक्षा विभाग उत्तराखंड में शिक्षिका हैं।

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