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लोकतन्त्र का काला सच या जनसेवा की हकीकत

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फोटो -साभार  आज संत रविदास जी की जयंती है। सार्वजनिक अवकाश होने के कारण गुप्ता जी को   कार्यालय   जाने की कोई टेंशन नहीं थी। लंबी तानकर सोने   का मन था। गुप्ता जी का मानना था कि जिंदगी का असली मजा तो सोने में है।   बीबी- बच्चों   से कल   रात ही करबद्ध प्रार्थना कर ली थी कि कृपा   करके सुबह- सुबह डिस्टर्ब न करें। बड़े - बड़े   पुण्यकर्मों के बाद तो   छुट्टी नसीब होती है , सो जी भरकर सो लेने दें ।       सुबह के सात ही बजे थे  ,  कि पत्नी ने झिंझोड़- झिंझोड़ कर जगा दिया। “ अजी ,  उठो न। कब से चिल्ला रही हूँ  ,  इंसान हो या कुंभकर्ण ?” क्या हुआ , क्या बात है ? सुबह- सुबह नींद क्यों खराब कर रही हो।   गुप्ता जी मन हुआ कि चीख- चीखकर आसमान सर पर उठा लें ,  पर एक आम भारतीय पति की तरह मजबूरी में गुस्सा पीने की आदत उन्हें पड़ चुकी थी। अरे ,  रामभरोसे आया है ,  अपना दूधवाला। तो मैं क्या करूँ ?  दूध तो तुमने लेना है न। वो आप से मिलना चाहता है। कोई जरूरी काम है शायद।  ...

कलम मेरी खामोश नहीं

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                           कलम मेरी खामोश नहीं ,  ये लिखती नई कहानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी ,  आंखों वाला पानी है।। सृजन की सरिता इससे बहती झूठ नहीं ये सच है कहती। जीवन के हर सुख-दुख में ये , कलम सदा संग मेरे रहती॥ ये मेरी सहचरी , मेरी सहेली  ,  मेरे दिल की रानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। इसने जीना मुझे सिखाया , सच से परिचय मेरा कराया। जीवन की सच्चाई लिखाकर , मुझे कवि इसने ही बनाया।। मेरे आपके अनुभवों की ,  ये तस्वीर नूरानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। कलम कवि का है हथियार , इसका है सब पर अधिकार। जीवन के इस महासागर में , कलम बनी मेरी पतवार।। अटल इरादों वाली है ये , इसकी चाल तूफानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। कलम का सौदा कर न सकूँगा , मैं खुद से धोखा कर न सकूँगा। इसके सहारे जीता हूँ मैं , इससे धोखा कर न सकूंगा॥ ये मेरी पहचान है , मेरे गौरव की ये निशा...

कलम मेरी खामोश नहीं

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                           कलम मेरी खामोश नहीं ,  ये लिखती नई कहानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी ,  आंखों वाला पानी है।। सृजन की सरिता इससे बहती झूठ नहीं ये सच है कहती। जीवन के हर सुख-दुख में ये , कलम सदा संग मेरे रहती॥ ये मेरी सहचरी , मेरी सहेली  ,  मेरे दिल की रानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। इसने जीना मुझे सिखाया , सच से परिचय मेरा कराया। जीवन की सच्चाई लिखाकर , मुझे कवि इसने ही बनाया।। मेरे आपके अनुभवों की ,  ये तस्वीर नूरानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। कलम कवि का है हथियार , इसका है सब पर अधिकार। जीवन के इस महासागर में , कलम बनी मेरी पतवार।। अटल इरादों वाली है ये , इसकी चाल तूफानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। कलम का सौदा कर न सकूँगा , मैं खुद से धोखा कर न सकूँगा। इसके सहारे जीता हूँ मैं , इससे धोखा कर न सकूंगा॥ ये मेरी पहचान है , मेरे गौरव की ये निशानी है। इसमें स्याही के ...

कलम मेरी खामोश नहीं

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                           कलम मेरी खामोश नहीं ,  ये लिखती नई कहानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी ,  आंखों वाला पानी है।। सृजन की सरिता इससे बहती झूठ नहीं ये सच है कहती। जीवन के हर सुख-दुख में ये , कलम सदा संग मेरे रहती॥ ये मेरी सहचरी , मेरी सहेली  ,  मेरे दिल की रानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। इसने जीना मुझे सिखाया , सच से परिचय मेरा कराया। जीवन की सच्चाई लिखाकर , मुझे कवि इसने ही बनाया।। मेरे आपके अनुभवों की ,  ये तस्वीर नूरानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। कलम कवि का है हथियार , इसका है सब पर अधिकार। जीवन के इस महासागर में , कलम बनी मेरी पतवार।। अटल इरादों वाली है ये , इसकी चाल तूफानी है। इसमें स्याही के बदले मेरी  , आंखों वाला पानी है।। कलम का सौदा कर न सकूँगा , मैं खुद से धोखा कर न सकूँगा। इसके सहारे जीता हूँ मैं , इससे धोखा कर न सकूंगा॥ ये मेरी पहचान है , मेरे गौरव की ये निशानी है। इसमें स्याही के ...

हिंदी दिवस पर विशेष कविता : भारत के माथे की बिंदी

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फोटो -साभार (इंटरनेट) भारत के माथे की बिंदी,  हिंदी है हम सबकी  हिंदी ।  जिससे अपनी संस्कृति ज़िंदी, हिंदी है वो सबकी  हिंदी॥  भारत के माथे की बिंदी... हिंदी से विज्ञान बना है, हिंदी में इतिहास पला है।  इसकी पावन ऊर्जा से ही संस्कृति का विहान चला है।।   तबलों की थापें हैं, इसमें वीणा के स्वर इसमें समाये ।  सामगान और वेद ऋचायेँ , हिंदी में ही समझी जायेँ ॥ ज्ञान और विज्ञान की कुंजी, हिंदी है हम सबकी  हिंदी । भारत के माथे की बिंदी... बंगाली हो या गुजराती , हिंदी हम सबकी भाषा है।  पंजाबी हो या मदरासी, हिंदी अब सबकी आशा है॥  उत्तर- दक्षिण, पूरब- पश्चिम, एका की ये परिचायक है। एक सूत्र में बांधे सबको,  भारत की उन्नायक है॥  कहे मराठी और कहे सिंधी , हिंदी है हम सबकी  हिंदी।  भारत के माथे की बिंदी... मैकाले के पुत्रों को ये बात समझ में क्यों न आती।  अपने हिंदुस्तान में हिंदी, खून के आँसू क्यों बहाती॥  लानत भेजूँ उन पर मैं जो, हिंदी बोलने में शरमाते।  व्यर्थ हैं वो विद्यालय जिनमें, हिंदी भाषी पीटे जाते॥...

हिंदी दिवस पर विशेष कविता : भारत के माथे की बिंदी

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फोटो -साभार (इंटरनेट) भारत के माथे की बिंदी,  हिंदी है हम सबकी  हिंदी ।  जिससे अपनी संस्कृति ज़िंदी, हिंदी है वो सबकी  हिंदी॥  भारत के माथे की बिंदी... हिंदी से विज्ञान बना है, हिंदी में इतिहास पला है।  इसकी पावन ऊर्जा से ही संस्कृति का विहान चला है।।   तबलों की थापें हैं, इसमें वीणा के स्वर इसमें समाये ।  सामगान और वेद ऋचायेँ , हिंदी में ही समझी जायेँ ॥ ज्ञान और विज्ञान की कुंजी, हिंदी है हम सबकी  हिंदी । भारत के माथे की बिंदी... बंगाली हो या गुजराती , हिंदी हम सबकी भाषा है।  पंजाबी हो या मदरासी, हिंदी अब सबकी आशा है॥  उत्तर- दक्षिण, पूरब- पश्चिम, एका की ये परिचायक है। एक सूत्र में बांधे सबको,  भारत की उन्नायक है॥  कहे मराठी और कहे सिंधी , हिंदी है हम सबकी  हिंदी।  भारत के माथे की बिंदी... मैकाले के पुत्रों को ये बात समझ में क्यों न आती।  अपने हिंदुस्तान में हिंदी, खून के आँसू क्यों बहाती॥  लानत भेजूँ उन पर मैं जो, हिंदी बोलने में शरमाते।  व्यर्थ हैं वो विद्यालय जिनमें, हिंदी भाषी पीटे जाते॥...

हिंदी दिवस पर विशेष कविता : भारत के माथे की बिंदी

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फोटो -साभार (इंटरनेट) भारत के माथे की बिंदी,  हिंदी है हम सबकी  हिंदी ।  जिससे अपनी संस्कृति ज़िंदी, हिंदी है वो सबकी  हिंदी॥  भारत के माथे की बिंदी... हिंदी से विज्ञान बना है, हिंदी में इतिहास पला है।  इसकी पावन ऊर्जा से ही संस्कृति का विहान चला है।।   तबलों की थापें हैं, इसमें वीणा के स्वर इसमें समाये ।  सामगान और वेद ऋचायेँ , हिंदी में ही समझी जायेँ ॥ ज्ञान और विज्ञान की कुंजी, हिंदी है हम सबकी  हिंदी । भारत के माथे की बिंदी... बंगाली हो या गुजराती , हिंदी हम सबकी भाषा है।  पंजाबी हो या मदरासी, हिंदी अब सबकी आशा है॥  उत्तर- दक्षिण, पूरब- पश्चिम, एका की ये परिचायक है। एक सूत्र में बांधे सबको,  भारत की उन्नायक है॥  कहे मराठी और कहे सिंधी , हिंदी है हम सबकी  हिंदी।  भारत के माथे की बिंदी... मैकाले के पुत्रों को ये बात समझ में क्यों न आती।  अपने हिंदुस्तान में हिंदी, खून के आँसू क्यों बहाती॥  लानत भेजूँ उन पर मैं जो, हिंदी बोलने में शरमाते।  व्यर्थ हैं वो विद्यालय जिनमें, हिंदी भाषी पीटे जाते॥...