बचपन पर एक बेहतरीन कविता...निश्छल बचपन है सम ईश्वर

बचपन जीवन का वह दौर होता है जो मन के किसी कोने में हमेशा छुपा होता है। जीवन को आनदं और सहजता से भर देता है। जीवन में ऊर्जित होकर कोई कार्य सम्पन्न करना हो तो स्वयं के भीतर ईश्वरीय वरदान अर्थात बचपन जिंदा रखे।भावसंचय पर प्रस्तुत है लक्ष्मी बिष्ट गड़िया की एक बेहतरीन कविता...

" निश्छल बचपन है सम ईश्वर "

न कोई उलझन यहाँ ,
दिमाग़ों के तार में।
हर मुश्किल के हल यहाँ,
सरल-सहज व्यवहार में।

शरारतें यहाँ कोई साजिश नहीं हैं।
यह तो मासूमियत की चरम स्थिति है।

बुद्धि के खेल में कहाँ तृप्ति है?
नादानियों में भी छुपी जिंदगी है।

झांक कर देखो स्वयं के भीतर,
जिंदा है अभी भी बचपन का मंजर।

तर्क और बहसों से इतर।
निश्छल बचपन है सम ईश्वर।

उम्र के सोपानों से गुजर कर,
होती है पूर्ण जीवन की डगर।

महसूस करनी है प्रबल जिजीविषा,
तो बचपन को जिओ हर मोड़ पर।

बचपन के रूप में जीवन
हमें यह सीख दे जाता ।
निष्काम भाव हो कर्मों का
तो लोभ-मोह आड़े नही आता।
..…..लक्ष्मी बिष्ट गड़िया

(लक्ष्मी बिष्ट गड़िया सूक्ष्म संवेदनाओं से युक्त कविताओं के लिए जानी जाती हैं, पत्र-पत्रिकाओं में सक्रिय उपस्थिति।संप्रति आप समग्र शिक्षा उत्तराखंड में जिला समन्वयक,देहरादून के पद पर कार्यरत हैं।)

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