धूमिल अक्षर : एक संवेदनशील प्रेम कविता

धूमिल अक्षर



तुम्हीं कहती थीं
सागर सा गहरा
आकाश सा विस्तृत
भूमि सा पवित्र
है हमारा रिश्ता,
फिर क्यों करे
हम कल की चिन्ता ।

आज जब पढ़ता हूं
तुम्हारे लिखें
फटे-पुराने पुर्जों से
बिखरे पड़े
पत्रों के अक्षर
अक्षरों पर बने
कुछ बूंदों के हस्ताक्षर,
वे बूंदें बहुत कुछ
कहती हैं
मैं देखता हूँ
उस नदी को
जो अक्षरों में बहती है।

मैं देख न पाया
जिस टीस को
आसक्ति के आवेग में
आज देखता हूँ उसे
वृहद नदी के रूप में .।
वही बहा ले गई
साथ-साथ
सागर सा गहरा
हमारा प्यार
आकाश सा विस्तृत
भूमि सा पवित्र
सपनों का संसार
अक्षरों के मध्य
सर्प सी दौड़ती,
हमारे मध्य
एक खाई छोड़ती,
बीच-बीच में
कहीं मुड़ती ,कहीं थमती ।
जैसे मुझे कुछ दिखा रही हो
मुझे चिढ़ा रही हो
कह रही हो. 'किसे कहते थे
तुम अपना प्यार ?
इन खाइयों में झांको
तुम्हें दिखाई देगा अपना आधार !

मैं फिर करता हूँ प्रयत्न
पढ़ने का
धूमिल अक्षरों को
समझने का
मैं क्यों देख न पाया
उस घड़ी बादलों का घुमड़ना
अक्षरों पर
बूंदों का टपकना
बूंदों का मिलना
नदी का बनना जो
बहा ले गई साथ अपने
मेरा हर सपना ?

क्यों धुंधला गई थी दृष्टि

क्यों धूमिल सी लगती थी सृष्टि ?


आज जब पलट रहा हूं
पन्ने अतीत के
निशान ढूंढता हूँ
अपनी प्रीत के
किसी पुरातत्ववेत्ता सा
उस खाई में झांकता हूँ
सोचता हूँ
यहीं बहा था
मेरा प्यार
यहीं उजड़ा था
मेरा संसार ।


हे ईश्वर !
ये टीस की बूंदें
फिर न जुड़ने पाएं
जुड़कर नदी न बनने पाएँ,
फिर न होने पाएं
किसी के मन पर
बूंदों के हस्ताक्षर
फिर कोई न पढ़े
ये धूमिल अक्षर !!
............ तनुज पंत 'अनंत'

कवि परिचय:

prem par kavita (तनुज पंत 'अनंत'  एक बैंक अधिकारी हैं। लेखन,पठन-पाठन में रूचि व  साहित्य
 के क्षेत्र में प्रभावी दखल रखते हैं.)




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