व्यथा: शिक्षक हैं या बहुउद्देशीय कर्मचारी?सरकारी विद्यालयों में पढ़ाई और गैर-शैक्षणिक कामों के बीच पिसता शिक्षक

हर सुबह विद्यालय पहुँचते ही शिक्षक के सामने सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होता कि आज बच्चों को न्यूटन के गति के नियम कैसे समझाने हैं, किसी कविता का भावार्थ कैसे स्पष्ट करना है या गणित के सवालों को आसान कैसे बनाना है। सवाल यह होता है कि आज कौन-सा पोर्टल खुला है, किसकी अंतिम तिथि नजदीक है, किसका डेटा अधूरा है और किस काम की सूचना अभी व्हाट्सऐप पर आई है! बच्चों की कक्षा की घंटियां तो बाद में बजती हैं, लेकिन शिक्षक के दिमाग में विभागीय आदेशों की घंटियाँ उससे पहले ही बजने लगती हैं।
उत्तराखंड के सरकारी विद्यालयों में शिक्षक की भूमिका आजकल इतनी बहुआयामी हो गई है कि कभी-कभी लगता है, नियुक्ति के समय विभाग ने उन्हें पढ़ाने के लिए चुना था या हर विभागीय और गैर विभागीय काम के लिए बहुउद्देशीय कर्मी बनाने के लिए!

कक्षा में विद्यार्थी, मोबाइल में पोर्टल और एप्स

एक समय था जब शिक्षक की पहचान उसके विषय-ज्ञान, पढ़ाने के तरीके, विद्यार्थियों के परिणाम और बच्चों के साथ उसके आत्मीय संबंधों से होती थी। आज इन सबके साथ एक नई योग्यता भी अनिवार्य-सी हो गई है—कितने पोर्टलों पर काम कर सकता है, कितने एप्स चला सकता है, कितने पासवर्ड संभालकर रखे हैं और कितनी बार ओटीपी आने के बाद भी लॉगिन करने में सफलता मिली है!

विद्यालयों में यूडायस प्लस इसका एक प्रमुख उदाहरण है। विद्यालय की आधारभूत सुविधाओं से लेकर विद्यार्थियों और शिक्षकों से संबंधित विवरण तक व्यवस्थित रूप से दर्ज करने होते हैं। यह जानकारी शिक्षा की योजना बनाने और कमियों की पहचान करने के लिए उपयोगी है। लेकिन जब अलग-अलग विवरण जुटाने, उनका मिलान करने, त्रुटियाँ सुधारने और निर्धारित समय-सीमा में प्रविष्टियाँ पूरी करने का काम सीमित कर्मचारियों वाले विद्यालय में शिक्षक के हिस्से आता है, तो परेशानी शुरू होती है।
अपार आई डी बनाने की प्रक्रिया को ही देख लीजिए। विद्यार्थियों के नाम, जन्मतिथि और अन्य विवरणों का मिलान, आधार संबंधी विसंगतियों का समाधान, अभिभावकों की सहमति लेना और रिकॉर्ड का सत्यापन—इन सबमें समय और धैर्य दोनों लगते हैं। इसका उद्देश्य विद्यार्थी की शैक्षिक उपलब्धियों का व्यवस्थित डिजिटल रिकॉर्ड बनाना है, जो निस्संदेह उपयोगी है। मगर किसी बच्चे के नाम की वर्तनी एक रिकॉर्ड में अलग और दूसरे में अलग हो, तो तकनीक सुविधा देने के बजाय शिक्षक को दस्तावेजों की भूल भुलैया में फंसा देती है। शिक्षक फिर अध्यापक कम और पूर्णकालिक डाटा एंट्री ऑपरेटर अधिक दिखाई देने लगता है।

स्विफ्ट चैट, मध्याह्न भोजन से लेकर हर दिन की रिपोर्ट तक

शिक्षक एवं छात्र उपस्थिति, छात्र प्रगति आदि के लिए स्विफ्ट चैट का उपयोग, एम डी एम की जानकारी देने के लिए एस एम एस, जैसे कार्य  भी रोज शिक्षक का काफी समय ले लेते हैं। सरकारी विद्यालयों में बच्चों को भोजन उपलब्ध कराना केवल एक योजना का क्रियान्वयन नहीं, बल्कि पोषण, स्वास्थ्य और विद्यालय में उपस्थिति से जुड़ा महत्वपूर्ण कार्य है। लेकिन पीएम पोषण (मध्याह्न भोजन) योजना के अंतर्गत भोजन वितरण, लाभार्थियों की संख्या, कार्यदिवसों और अन्य निर्धारित विवरणों का रिकॉर्ड एस एम एस तथा पोर्टल पर रिपोर्टिंग भी आवश्यक होती है।

कल्पना कीजिए कि एक ही शिक्षक को कक्षा में बच्चों को पढ़ाना है, भोजन व्यवस्था पर निगरानी रखनी है, रजिस्टर भरने हैं और फिर निर्धारित प्रारूप में डाक बनाकर आँकड़े भी तो भेजने हैं। भोजन में नमक कम हुआ तो शिकायत सुनिए, भोजन की रिपोर्ट अधूरी हुई तो स्पष्टीकरण दीजिए और पाठ्यक्रम पीछे रह गया तो परिणाम की जिम्मेदारी भी आपकी!

हालांकि इन सरकारी व्यवस्थाओं का उद्देश्य उचित तो है, पर प्रश्न यह है कि एक ही व्यक्ति से पढ़ाने, व्यवस्था सँभालने, रिकॉर्ड रखने और निगरानी करने की अपेक्षा आखिर किस हद तक की जा सकती है?

विद्यालय में प्रधानाचार्य हों या शिक्षक, उन्हें अक्सर विभागीय सूचनाएँ संकलित करने, विभिन्न प्रारूपों में रिपोर्ट तैयार करने, छात्रवृत्ति और अन्य योजनाओं से जुड़े रिकॉर्ड में सहयोग करने, प्रवेश एवं नामांकन संबंधी सूचनाएँ देने तथा विद्यालय की गतिविधियों का विवरण प्रस्तुत करने जैसे काम भी सँभालने पड़ते हैं। उस पर तुर्रा ये कि कोई न कोई दिवस या पखवाड़ा भी मनाना है। हालांकि इनमें से अनेक काम आवश्यक हैं। समस्या काम की उपयोगिता से नहीं, बल्कि उसके बँटवारे और मात्रा से है।

चुनाव ड्यूटी, जनगणना और गैर शैक्षणिक दायित्व

शिक्षक को विद्यालय की चारदीवारी से बाहर भी कई बार सरकारी व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा बनना पड़ता है। चुनाव से जुड़ी बीएलओ, एस आई आर संबंधी जिम्मेदारियाँ, मतदाता सूची का पुनरीक्षण, चुनाव ड्यूटी और समय-समय पर सौंपे जाने वाले अन्य प्रशासनिक कार्य इसके उदाहरण हैं। आपदा या विशेष परिस्थितियों में भी सरकारी शिक्षकों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि इन कार्यों में  बड़ी संख्या में कार्मिकों की आवश्यकता होती है, जिसमें शिक्षकों की भागीदारी होना आवश्यक प्रतीत होता है, लेकिन ऐसी परिस्थिति में विभिन्न विभागों के बीच तालमेल का अभाव शिक्षकों के लिए मुसीबत खड़ी कर देता है।मसलन आजकल जनगणना प्रशिक्षण अगर जरूरी है, तो उसी समय विभागीय प्रशिक्षणों में भी शिक्षकों को प्रतिभाग करने हेतु मजबूर कर विद्यालयों को खाली करना कहां तक उचित है?

उत्तराखंड जैसे पर्वतीय राज्य में यह चुनौती कई जगह और भी कठिन हो जाती है। दूरस्थ गाँवों में स्थित विद्यालय, लंबी पैदल दूरी, सीमित इंटरनेट कनेक्टिविटी और शिक्षकों की कमी पहले ही शिक्षकों के काम को बढ़ा देते हैं। ऐसे में यदि किसी शिक्षक को विद्यालय से बाहर किसी भी कार्य के लिए भेजा जाए या अचानक किसी रिपोर्ट की समय-सीमा तय कर दी जाए, तो उसकी अनुपस्थिति का सीधा असर कक्षा पर पड़ सकता है।

एक शिक्षक अवकाश पर गया और दूसरा विभागीय कार्य से बाहर है, तो कई बार शेष शिक्षक को दो कक्षाओं के विद्यार्थियों को एक साथ सँभालना पड़ता है। ऐसे में पाठ्यक्रम पूरा करने की अपेक्षा करना कुछ वैसा ही है जैसे किसी व्यक्ति को एक ही समय में दो पहाड़ चढ़ने का लक्ष्य दे देना और नीचे खड़े होकर पूछना—“अभी तक पहुँचे क्यों नहीं?” और एकल शिक्षक वाले विद्यालयों में तो कोढ़ में खाज वाली स्थिति बन जाना स्वाभाविक ही है।

प्रशिक्षण भी, बैठक भी, रिपोर्ट भी—पढ़ाई कब?

शिक्षकों का प्रशिक्षण आवश्यक है। नई शिक्षा नीति, दक्षता आधारित शिक्षण, मूल्यांकन की नई विधियाँ और डिजिटल शिक्षण जैसे विषयों पर प्रशिक्षण से शिक्षा की गुणवत्ता बेहतर हो सकती है। उत्तराखंड में भी शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लेकिन प्रशिक्षण का वास्तविक लाभ तभी है, जब शिक्षक को सीखी गई बातों को कक्षा में आजमाने का अवसर मिले।

यदि प्रशिक्षण के साथ लगातार बैठकें, समीक्षा, लक्ष्य निर्धारण, रिपोर्टिंग और अलग-अलग प्रारूपों में अनुपालन की माँग जुड़ती जाए, तो प्रशिक्षण भी महज 'एक और काम' बनकर रह जाता है। शिक्षक नई शिक्षण विधि सीखकर लौटता है, लेकिन कक्षा में पहुँचने से पहले उसे पाँच सूचनाएँ भेजनी हैं, तीन रिकॉर्ड अपडेट करने हैं और एक रिपोर्ट तैयार करनी है। मोबाइल पर कर्मयोगी, प्रशस्त, टीचर एप, दीक्षा जैसे कार्यक्रमों के वीडियो देखकर अपना वेतन बाधित होने से भी तो बचाना है।

डिजिटल व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य काम आसान करना था। लेकिन जब एक ही जानकारी अलग-अलग पोर्टलों, स्प्रेडशीटों, गूगल फॉर्मों और व्हाट्सऐप समूहों में माँगी जाने लगे, तो डिजिटलीकरण का अर्थ काम का सरलीकरण नहीं, बल्कि कागज की जगह स्क्रीन पर बढ़ती हुई फाइलों का जंजाल हो जाता है। इसलिए अब शिक्षक की मेज पर फाइलों का ढेर भले न हो, मोबाइल की स्क्रीन पर सूचनाओं का पहाड़ जरूर खड़ा रहता है।प्रशिक्षणों का उद्देश्य आंकड़ों को बढ़ाकर महज अपनी पीठ थपथपाना हो तो ऐसे प्रशिक्षणों की सार्थकता पर भी प्रश्नचिन्ह लगना स्वाभाविक ही है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति कहती क्या है?

विडंबना देखिए कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शिक्षकों के गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगने वाला समय कम करने और उन्हें शिक्षण पर अधिक केंद्रित रखने की बात करती है। नीति में शिक्षकों को लंबे चुनावी दायित्वों, मध्याह्न भोजन संबंधी कार्यों और विभिन्न प्रशासनिक कामों से अलग रखने की मंशा भी व्यक्त की गई है।

यानी नीति का संदेश साफ है—शिक्षक का मुख्य काम पढ़ाना है। फिर व्यवहार में शिक्षक के पास पढ़ाने के अतिरिक्त इतने काम क्यों जमा होते जा रहे हैं? यदि हर नई योजना के साथ नया पोर्टल, हर समीक्षा के साथ नया प्रारूप और हर लक्ष्य के साथ नई रिपोर्ट जुड़ती जाएगी, तो नीति के पन्नों पर बचा शिक्षण धरातल पर कहाँ दिखाई देगा?

यह कहना उचित नहीं होगा कि हर गैर-शैक्षणिक काम निरर्थक है या हर पोर्टल अनावश्यक है। पारदर्शिता, जवाबदेही और सही आँकड़े किसी भी सार्वजनिक व्यवस्था के लिए जरूरी हैं। लेकिन जवाबदेही का अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि वास्तविक काम करने वाले व्यक्ति का अधिकांश समय उस काम का प्रमाण देने में ही बीत जाए।

बच्चे को पढ़ाना और यह प्रमाणित करना कि बच्चे को पढ़ाया जा रहा है—दो अलग - अलग काम हैं। दुर्भाग्य से, कई बार दूसरा काम पहले पर भारी पड़ता दिखाई देता है।

समाधान शिक्षक को उपदेश देने में नहीं, व्यवस्था सुधारने में है

समस्या का समाधान यह नहीं कि शिक्षक समय प्रबंधन सीखें, मोबाइल चलाना और बेहतर कर लें या छुट्टी के बाद कुछ घंटे और काम कर लें। शिक्षक पहले से ही समय, संसाधनों और अपेक्षाओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। जरूरत प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव की है।

सबसे पहले, विद्यालय से संबंधित सूचनाओं के लिए एकीकृत डिजिटल मंच विकसित किया जाए, ताकि एक बार दर्ज की गई जानकारी का उपयोग सभी संबंधित विभाग कर सकें। बार-बार वही विवरण भरने की बाध्यता समाप्त हो। प्रत्येक रिपोर्ट की उपयोगिता की समीक्षा हो और अनावश्यक प्रारूपों को हटाया जाए।

दूसरे, डेटा एंट्री, तकनीकी सहायता, अभिलेख संधारण और योजनाओं की रिपोर्टिंग के लिए विद्यालयों में पर्याप्त गैर-शैक्षणिक कर्मचारी उपलब्ध कराए जाएँ। जहाँ यह संभव न हो, वहाँ संकुल, विकासखंड या जिला स्तर पर साझा तकनीकी सहायता केंद्र बनाए जा सकते हैं। पर्वतीय क्षेत्रों में इंटरनेट की समस्या को ध्यान में रखकर ऑफलाइन सुविधा और पर्याप्त समय भी दिया जाए।

तीसरे, शिक्षकों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगाने से पहले यह देखा जाए कि उससे कितनी कक्षाएँ प्रभावित होंगी। आवश्यक सरकारी दायित्वों के लिए भी ऐसी व्यवस्था हो कि विद्यार्थियों की पढ़ाई न्यूनतम प्रभावित हो। हर नई रिपोर्ट जारी करने से पहले विभाग स्वयं पूछे—क्या यह जानकारी पहले से उपलब्ध है? क्या इसे किसी अन्य स्रोत से प्राप्त किया जा सकता है? और क्या इसके लिए शिक्षक का समय लेना वास्तव में जरूरी है?

सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि विद्यालय की सफलता का मूल्यांकन केवल पोर्टल पर भरे गए कॉलम, अपलोड की गई तस्वीरों और समय पर भेजी गई रिपोर्टों से नहीं होना चाहिए। यह भी देखा जाए कि बच्चे कितना सीख रहे हैं, शिक्षक उन्हें कितना व्यक्तिगत सहयोग दे पा रहे हैं और विद्यालय में सीखने का वातावरण कैसा है।

और अंत में...

उत्तराखंड जैसे राज्य में शिक्षक केवल नौकरी नहीं करता; वह अनेक स्थानों पर सीमित संसाधनों के बीच बच्चों के भविष्य की नींव रखता है। किसी दूरस्थ गाँव में वह शिक्षक ही बच्चों के लिए विज्ञान की प्रयोगशाला, पुस्तकालय, मार्गदर्शक और अभिभावक भी - इन सबका विकल्प बन जाता है। उसकी ऊर्जा यदि बार-बार पोर्टल, रिपोर्ट और प्रशासनिक औपचारिकताओं में खर्च होगी, तो इसका नुकसान किसी एक छात्र को नहीं, पूरी पीढ़ी को होगा।

अब समय आ गया है कि शिक्षा विभाग शिक्षक से यह पूछना बंद करे कि “पोर्टल पर प्रविष्टि पूरी क्यों नहीं हुई?” बल्कि यह पूछे कि “आज बच्चों ने नया क्या सीखा?”

क्योंकि विद्यालय की असली प्रगति पोर्टल के हरे टिक में नहीं, विद्यार्थी की आँखों की चमक में दिखाई देती है। यह बात शिक्षा के सभी हितधारकों को अवश्य समझनी चाहिए। 
         © प्रदीप बहुगुणा ' दर्पण '
(अस्वीकरण: यह आलेख लेखक के व्यक्तिगत चिंतन पर आधारित है, जिसका उद्देश्य किसी व्यक्ति, संस्था या व्यवस्था की आलोचना करना नहीं है। इससे सबका सहमत होना भी जरूरी नहीं है।) 







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